पाकिस्तान में दो हिंदू लड़कियों के अपहरण और धर्म परिवर्तन पर पाकिस्तान के हिंदू भी सवाल खड़ा कर रहे हैं.
सिंध की दो नाबालिग़ हिंदू लड़कियों और उनके पिता का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद जांच के आदेश दिए गए हैं.
मामला गुरुवार का है लेकिन रविवार को भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के ट्वीट के बाद ये और सुर्ख़ियों में आया.
पाकिस्तान में लोग सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आख़िर कम उम्र की हिंदू लड़कियां ही क्यों इस्लाम से प्रभावित होकर धर्म परिवर्तन करती हैं?
यहां के पत्रकार कपिल देव ने सवाल किया है, "आख़िर नाबालिग़ हिंदू लड़कियां ही इस्लाम से क्यों प्रभावित होती हैं? क्यों उम्रदराज़ मर्द या औरतें इससे प्रभावित नहीं होते? क्यों धर्मपरिवर्तन के बाद लड़कियां केवल पत्नियां बनती हैं, बेटियां या बहनें नहीं बनतीं?"
कहा जा रहा है कि इन लड़कियों को पाकिस्तान में सिंध प्रांत के घोटकी ज़िले से अग़वा किया गया था.
लड़की के भाई और पिता का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है जिसमें वो अपना दर्द बयां कर रहे हैं.
दूसरी तरफ़ एक वैसा वीडियो भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया है जिसमें वो अपनी इच्छा से इस्लाम स्वीकार करने की बात कह रही हैं.
पाकिस्तान के सूचना मंत्री चौधरी फ़व्वाद हुसैन ने ट्वीट कर बताया है कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पंजाब और सिंध की सरकारों को जांच के लिए कहा है.
पाकिस्तान में ट्विटर पर का हैश टैग भी वायरल हो रहा है.
यहां के हिंदू समुदाय के लोग ज़बर्दस्ती धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने और अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने की मांग कर रहे हैं.
हिंदू समुदाय से आने वाले पाकिस्तान के ब्लॉगर मुकेश मेघवार ने ट्वीट किया है, "16 साल की उम्र में मलाला किताब नहीं लिख सकतीं लेकिन 12 और 14 साल की हिंदू लड़कियां इस्लाम क़ुबूल कर सकती हैं? (प्योर नेशनल लॉजिक)"
मुर्तज़ा सोलांगी ने भी सवाल किया है, "क्यों नाबालिग़ हिंदू लड़कियां ही इस्लाम क़ुबूल करती हैं और उन्हें तुरंत पति मिल जाता है? भाई क्यों नहीं मिलता? उन्हें हिंदू लड़के या बड़ी उम्र के लोग क्यों नहीं मिलते? इस पर सोचिए, इसे समझना बहुत मुश्किल भी नहीं."
पाकिस्तान में मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार और आम लोगों ने भी इस तरह की घटनाओं पर आक्रोश व्यक्त किया है.
पाकिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता ज़ैनब बलोच ने दोनों लड़कियों का एक वीडियो ट्वीट किया है.
इसमें एक लड़की रोते हुए बता रही है कि जिन लड़कों से उनका निकाह कराया गया, वो उन्हें और उनके घर वालों को मारते-पीटते हैं.
बलोच लिखती हैं, "मुल्तान की दो असहाय हिंदू लड़कियां, जिनका कथित रूप से अपहरण किया गया. ख़ुद को कट्टरपंथियों से बचाए जाने की गुहार लगा रही हैं. रीना और रवीना का सिंध में अपहरण और धर्म परिवर्तन के बाद ये ख़बरें आई हैं."
इस ख़बर पर अभी हंगामा मचा ही हुआ है कि सिंध से एक और हिंदू लड़की के अपहरण और धर्मपरिवर्तन की ख़बरें पाकिस्तानी मीडिया में आई हैं.
पत्रकार बिलाल फ़ारुक़ी ने ट्वीट किया है, "एक और हिंदू लड़की सोनिया भील का सिंध में अपहरण कर लिया गया. ये तब हुआ है जब हाल ही में दो हिंदू लड़कियों रीना और रवीना के अपहरण और धर्म परिवर्तन की ख़बरें सुर्खियों में हैं. ये सरकार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में क्यों असफल साबित हो रही है?"
लेकिन ट्वीट पर कुछ पाकिस्तानी सोशल मीडिया यूज़र्स ने भारत में अल्पसंख्यकों की हालत पर भी सवाल खड़े किए हैं.
भारत में होली के दिन दिल्ली के पास गुरुग्राम में एक मुस्लिम परिवार की कुछ गुंडों ने घर में घुस पर पिटाई की थी, जिस पर काफ़ी हंगामा मचा हुआ है.
ट्विटर यूज़र अमीर तैमूर ख़ान ने लिखा है, "मिस्टर चौकीदार सुषमा स्वराज आपने दो हिंदू लड़कियों के अपहरण के बारे में पूछा है और हमने जवाब दे दिया. अब आप दिल्ली में मुस्लिम परिवार की बेरहमी के साथ जानवरों की तरह पिटाई के बारे में हमें बताएंगी?"
उधर, पाकिस्तानी अख़बारों ने भी हिंदू लड़िकियों के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन की ख़बर को सुर्खि़यां बनाई हैं .
पाकिस्तान के चुनिंदा अंग्रेज़ी अख़बारों ने इसे टॉप स्टोरी बनाया है. लगभग सभी अख़बारों ने अपने पहले पन्ने की इसे लीड बनाया है.
द डॉन अख़बार ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की ओर से जांच के आदेश दिए जाने की ख़बर प्रमुखता से प्रकाशित की है.
अख़बार ने लिखा है, 'पीएम ने पंजाब और सिंध की सरकारों को कथित अपहरण और जबरन धर्मांतरण मामले की जांच के आदेश दिए.'
लड़कियों और उनके पिता के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद ये मामला सुर्खि़यों में आया.
ख़बर में लिखा है, 'हालांकि लड़कियों का एक और वीडियो सामने आया है जिसमें वो कह रही हैं कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म स्वीकार किया है. '
Monday, March 25, 2019
Monday, March 18, 2019
भारत-पाक अपने ग़ुस्से को पीने पर क्यों हैं मजबूर- वुसत का ब्लॉग
जब चार दिन पहले भारत और पाकिस्तान ने अटारी में सीमापार करतारपुर कॉरिडोर बनाने के बारे में विस्तार से बातचीत की और उसके बाद सौहार्दपूर्ण वातावरण की बात करते हुए संयुक्त घोषणापत्र जारी किया तो मुझे भी ख़ुशी हुई कि आपसी गर्मागर्मी और छिछा-लेदर अपनी जगह, पर चलिए चार वर्ष में पहली बार किसी भी विषय पर किसी भी बहाने दोनों मिल तो बैठे और जल्दी फिर मिल बैठेंगे.
मगर अगले ही दिन अख़बार 'द हिंदू' में ये पढ़ कर मज़ा किरकिरा हो गया कि बातचीत में भाग लेगने वाले एक भारतीय कर्मचारी का कहना है कि वो पाकिस्तान के रवैये से ख़ुश नहीं.
पहले पाकिस्तान वीज़ा फ्री कॉरिडोर की बात कर रहा था अब वो यात्रियों के लिए कुछ फीस के साथ स्पेशल परमिट की शर्त लगा रहा है.
भारत कहता है कि रोज़ाना पांच हज़ार यात्रियों को करतारपुर साहिब के दर्शन की इजाज़त होनी चाहिए और पाकिस्तान कहता है कि सात सौ यात्री रोज़ाना ठीक हैं.
भारत कहता है कि यात्रियों को पैदल आने जाने की इजाज़त होनी चाहिए और पाकिस्तान कहता है कि नहीं. 15-15 के ग्रुप में गाड़ी में बैठा कर लाया ले जाया जाएगा.
इसके अलावा पाकिस्तान ने गुरुद्वारे की वो सौ एकड़ ज़मीन भी कॉरिडोर तामीर के बहाने कब्ज़े में ले ली है जो महाराजा रणजीत सिंह ने दान की थी.
और ये कि उत्तरी अमरीका की सिख फ़ॉर जस्टिस नामक संस्था ने अगले वर्ष करतारपुर में 'ख़ालिस्तान रेफेरेन्डम' के नाम से एक सम्मेलन का भी ऐलान किया है. इससे पता चलता है कि इन लोगों को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है.
हो सकता है कि दोनों देशों की मुलाक़ात के अंदर की ये सब बातें ठीक हों लेकिन पाकिस्तान ने अंदर की कोई बात भी मीडिया को अब तक नहीं बताई. सिर्फ़ ये कहा है कि अगली मुलाक़ात दो अप्रैल को होगी.
जब मुलाक़ात होती है तो दोनों तरफ़ से दस तरह की बातें एक दूसरे के सामने रखी जाती हैं. क्या ये उचित है कि किसी भी समझौते से पहले अंदर की सारी बातें मीडिया को पता चल जाएं.
वैसे इनमें से ऐसी कौन-सी बात है जो मिल बैठकर नहीं सुलझाई जा सकती और उसे चौक में बैठ कर तय करना ही ज़रूरी है?
मुझे ऐसा लग रहा है कि करतारपुर कॉरिडोर पर दोनों देश एक दूसरे को दूध तो ज़रूर पेश कर रहे हैं लेकिन मेघनिया डाल कर. और नुक़सान किसका है- सिर्फ़ समुदाय का.
आपने बचपन में लोमड़ी और सारस की कहानी तो ज़रूर सुनी होगी जिनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती.
एक दिन शेर ने कहा कि "बस अब बहुत हो गया, अब दोस्ती कर लो."
शेर के कहने पर दोनों ने मजबूरन हाथ मिलाया और लोमड़ी ने सारस को खाने पर बुलाया.
सारस जब बन-ठन कर आया तो लोमड़ी ने पतले शोरबे से भरी प्लेट सारस के आगे रख दी. अब सारस की चोंच इतनी लंबी थी कि प्लेट में रखा शोरबा पीना बहुत मुश्किल था. तो लोमड़ी ने कहा कि "अरे भाई सारस आप तो बहुत तकल्लुफ़ कर रहे हैं, ये देखिए ऐसे पिया जाता है."
और फिर लोमड़ी ने ज़बान निकाली और लप-लप कर के सारा शोरबा सुड़क लिया.
अगले दिन सारस ने भी लोमड़ी को खाने पर बुलाया और सामने एक सुराही रख दी जिसके अंदर बोटियां पड़ी हुई थीं.
अब भला लोमड़ी की थूथनी सुराही में कैसे जाती. ग़ुस्सा तो बहुत आया मगर पी गई.
सारस ने कहा, "लोमड़ी आपा, आप तो बहुत ही तकल्लुफ कर रही हैं. ये देखिए सुराही में से बोटियां ऐसे खाते हैं."
सारस ने अपनी पतली चोंच सुराही में डाली और सारी बोटियां सटक लीं.
मैं सोच रहा हूं कि अटारी में तो भारत को ग़ुस्सा आ गया अब दो अप्रैल को वाघा में पाकिस्तान भारतीय शिष्टमंडल को करतारपुर की थाली में शोरबा पिलाएगा या सुराही में बोटियां परोसेगा.
मगर अगले ही दिन अख़बार 'द हिंदू' में ये पढ़ कर मज़ा किरकिरा हो गया कि बातचीत में भाग लेगने वाले एक भारतीय कर्मचारी का कहना है कि वो पाकिस्तान के रवैये से ख़ुश नहीं.
पहले पाकिस्तान वीज़ा फ्री कॉरिडोर की बात कर रहा था अब वो यात्रियों के लिए कुछ फीस के साथ स्पेशल परमिट की शर्त लगा रहा है.
भारत कहता है कि रोज़ाना पांच हज़ार यात्रियों को करतारपुर साहिब के दर्शन की इजाज़त होनी चाहिए और पाकिस्तान कहता है कि सात सौ यात्री रोज़ाना ठीक हैं.
भारत कहता है कि यात्रियों को पैदल आने जाने की इजाज़त होनी चाहिए और पाकिस्तान कहता है कि नहीं. 15-15 के ग्रुप में गाड़ी में बैठा कर लाया ले जाया जाएगा.
इसके अलावा पाकिस्तान ने गुरुद्वारे की वो सौ एकड़ ज़मीन भी कॉरिडोर तामीर के बहाने कब्ज़े में ले ली है जो महाराजा रणजीत सिंह ने दान की थी.
और ये कि उत्तरी अमरीका की सिख फ़ॉर जस्टिस नामक संस्था ने अगले वर्ष करतारपुर में 'ख़ालिस्तान रेफेरेन्डम' के नाम से एक सम्मेलन का भी ऐलान किया है. इससे पता चलता है कि इन लोगों को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है.
हो सकता है कि दोनों देशों की मुलाक़ात के अंदर की ये सब बातें ठीक हों लेकिन पाकिस्तान ने अंदर की कोई बात भी मीडिया को अब तक नहीं बताई. सिर्फ़ ये कहा है कि अगली मुलाक़ात दो अप्रैल को होगी.
जब मुलाक़ात होती है तो दोनों तरफ़ से दस तरह की बातें एक दूसरे के सामने रखी जाती हैं. क्या ये उचित है कि किसी भी समझौते से पहले अंदर की सारी बातें मीडिया को पता चल जाएं.
वैसे इनमें से ऐसी कौन-सी बात है जो मिल बैठकर नहीं सुलझाई जा सकती और उसे चौक में बैठ कर तय करना ही ज़रूरी है?
मुझे ऐसा लग रहा है कि करतारपुर कॉरिडोर पर दोनों देश एक दूसरे को दूध तो ज़रूर पेश कर रहे हैं लेकिन मेघनिया डाल कर. और नुक़सान किसका है- सिर्फ़ समुदाय का.
आपने बचपन में लोमड़ी और सारस की कहानी तो ज़रूर सुनी होगी जिनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती.
एक दिन शेर ने कहा कि "बस अब बहुत हो गया, अब दोस्ती कर लो."
शेर के कहने पर दोनों ने मजबूरन हाथ मिलाया और लोमड़ी ने सारस को खाने पर बुलाया.
सारस जब बन-ठन कर आया तो लोमड़ी ने पतले शोरबे से भरी प्लेट सारस के आगे रख दी. अब सारस की चोंच इतनी लंबी थी कि प्लेट में रखा शोरबा पीना बहुत मुश्किल था. तो लोमड़ी ने कहा कि "अरे भाई सारस आप तो बहुत तकल्लुफ़ कर रहे हैं, ये देखिए ऐसे पिया जाता है."
और फिर लोमड़ी ने ज़बान निकाली और लप-लप कर के सारा शोरबा सुड़क लिया.
अगले दिन सारस ने भी लोमड़ी को खाने पर बुलाया और सामने एक सुराही रख दी जिसके अंदर बोटियां पड़ी हुई थीं.
अब भला लोमड़ी की थूथनी सुराही में कैसे जाती. ग़ुस्सा तो बहुत आया मगर पी गई.
सारस ने कहा, "लोमड़ी आपा, आप तो बहुत ही तकल्लुफ कर रही हैं. ये देखिए सुराही में से बोटियां ऐसे खाते हैं."
सारस ने अपनी पतली चोंच सुराही में डाली और सारी बोटियां सटक लीं.
मैं सोच रहा हूं कि अटारी में तो भारत को ग़ुस्सा आ गया अब दो अप्रैल को वाघा में पाकिस्तान भारतीय शिष्टमंडल को करतारपुर की थाली में शोरबा पिलाएगा या सुराही में बोटियां परोसेगा.
Friday, March 15, 2019
मुंबई: छत्रपति शिवाजी स्टेशन के पास पुल गिरा, सेफ़्टी ऑडिट पर उठे सवाल
मुंबई में छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) रेलवे स्टेशन के पास एक फुटओवर ब्रिज के गिरने से कम से कम 34 लोग ज़ख़्मी हुए हैं और पांच लोगों की मौत हो गई है.
यह हादसा गुरुवार शाम को 7:30 बजे तब हुआ जब लोगों की काफ़ी भीड़ होती है. पुलिस का कहना है कि ब्रिज का एक हिस्सा गिरा है. घायलों को जीटी और संत जॉर्ज हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है.
इस मामले में मुंबई पुलिस ने ट्वीट कर कहा है, ''सीएसटी के प्लेटफॉर्म नंबर एक और टाइम्स ऑफ इंडिया के दफ़्तर के पास बीटी लेन को जोड़ने वाला हिस्सा गिरा है. घायलों को हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है. गाड़ियों की आवाजाही प्रभावित हुई है.''
चश्मदीदों का कहना है कि गुरुवार सुबह मरम्मत का काम चल रहा था फिर भी लोग ब्रिज का इस्तेमाल कर रहे थे.
मौके पर मौजूद बीबीसी संवाददाता मयूरेश कोण्णुर का कहना है कि पुल का कुछ हिस्सा गिर गया था लेकिन पूरा पुल ही गिरा दिया गया है, हालांकि पुल का ढांचा अभी मौजूद है. वो कहते हैं कि अब ये देखना होता कि क्या इसी ढांचे पर फिर से पुल बनाया जाएगा.
मयूरेश बताते हैं कि यह ब्रिज एक तरफ से रेलवे से निकलता था और ब्रिहनमुंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की एक इमारत में जाता था. ऐसे में अब तक ये पता नहीं चल पाया है कि ये ब्रिज किसके तहत आता है और इसके रखरखाव के लिए ज़िम्मेदार कौन है.
प्रदेश के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने इस मामले में उच्चस्तरीय जांच के लिए आदेश दिए हैं. उन्होंने मृतकों के परिजनों के लिए पांच लाख रुपये के मुआवज़े की घोषणा की है साथ ही घायलों के लिए 50 हज़ार रुपये की मदद और मुफ्त इलाज की घोषणा की है.
मयूरेश कोण्णुर बताते हैं कि कुछ वक्त पहले मुंबई में एल्फिन्स्टन में पैदल पार पुल (अब इस जगह का नाम प्रभादेवी है) गिर गया था जिसमें बीस से अधिक लोगों की मौत हुई थी. इस हादसे के बाद मुख्यमंत्री ने रेलवे और बीएमसी को मुंबई के सभी पुराने पुलों के ऑडिट का आदेश दिया था.
वो बताते हैं कि इस ऑडिट रिपोर्ट में जो जानकारी आई थी उसके अनुसार छत्रपति शिवाजी स्टेशन के पास का ब्रिज दुरुस्त था. लेकिन अब इस पुल के टूटने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि पुल सही हालत में था तो हादसा क्यों हुआ और ऑडिट रिपोर्ट में ग़लत जानकारी क्यों दी गई.
मुख्यमंत्री ने उच्चस्तरीय जांच में ये पता करने के आदेश भी दिए हैं कि ऑडिट रिपोर्ट किसने और कैसे बनाई. साथ ही उन्होंने कड़े कदम उठाने की बात भी की है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हादसे पर दुख जताते हुए ट्विटर पर लिखा है, "मेरी संवेदना पीड़ित परिवारों के साथ है और उम्मीद है कि हादसे में में घायल हुए लोग जल्द स्वस्थ होंगे. महाराष्ट्र सरकार पीड़ितों की मदद की हरसंभव कोशिश कर रही है."
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने लिखा है कि कि रेलवे के डॉक्टर और अधिकारी राहत और बचाव कार्य में बीएमसी के अधिकारियों की मदद कर रहे हैं.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हादसे की ख़बर पर अफसोस जताया है और ट्विटर पर लिखा है कि उनकी संवेदना मृतकों के परिजनों के साथ हैं.
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि "मोदी सरकार और महाराष्ट्र सरकार के दौर में कई हादसे हुए हैं- एल्फिन्स्टन में पैदल पार पुल में भगदड़, अंधेरी में बीते साल जुलाई में पुल गिरा था. रेलवे मंत्रालय के ऑडिट के दावे बार-बार ग़लत साबित हो रहे हैं. रेलवे मंत्री को इस्तीफ़ा देना चाहिए, या फिर उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए."
समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ट्वीट किया है, "मुंबई में पुल गिरने की बड़ी दुर्घटनाएं लगातार हो रहीं हैं. सरकार पुलों के सेफ़्टी ऑडिट को गंभीरता से नहीं ले रही है."
यह हादसा गुरुवार शाम को 7:30 बजे तब हुआ जब लोगों की काफ़ी भीड़ होती है. पुलिस का कहना है कि ब्रिज का एक हिस्सा गिरा है. घायलों को जीटी और संत जॉर्ज हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है.
इस मामले में मुंबई पुलिस ने ट्वीट कर कहा है, ''सीएसटी के प्लेटफॉर्म नंबर एक और टाइम्स ऑफ इंडिया के दफ़्तर के पास बीटी लेन को जोड़ने वाला हिस्सा गिरा है. घायलों को हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है. गाड़ियों की आवाजाही प्रभावित हुई है.''
चश्मदीदों का कहना है कि गुरुवार सुबह मरम्मत का काम चल रहा था फिर भी लोग ब्रिज का इस्तेमाल कर रहे थे.
मौके पर मौजूद बीबीसी संवाददाता मयूरेश कोण्णुर का कहना है कि पुल का कुछ हिस्सा गिर गया था लेकिन पूरा पुल ही गिरा दिया गया है, हालांकि पुल का ढांचा अभी मौजूद है. वो कहते हैं कि अब ये देखना होता कि क्या इसी ढांचे पर फिर से पुल बनाया जाएगा.
मयूरेश बताते हैं कि यह ब्रिज एक तरफ से रेलवे से निकलता था और ब्रिहनमुंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की एक इमारत में जाता था. ऐसे में अब तक ये पता नहीं चल पाया है कि ये ब्रिज किसके तहत आता है और इसके रखरखाव के लिए ज़िम्मेदार कौन है.
प्रदेश के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने इस मामले में उच्चस्तरीय जांच के लिए आदेश दिए हैं. उन्होंने मृतकों के परिजनों के लिए पांच लाख रुपये के मुआवज़े की घोषणा की है साथ ही घायलों के लिए 50 हज़ार रुपये की मदद और मुफ्त इलाज की घोषणा की है.
मयूरेश कोण्णुर बताते हैं कि कुछ वक्त पहले मुंबई में एल्फिन्स्टन में पैदल पार पुल (अब इस जगह का नाम प्रभादेवी है) गिर गया था जिसमें बीस से अधिक लोगों की मौत हुई थी. इस हादसे के बाद मुख्यमंत्री ने रेलवे और बीएमसी को मुंबई के सभी पुराने पुलों के ऑडिट का आदेश दिया था.
वो बताते हैं कि इस ऑडिट रिपोर्ट में जो जानकारी आई थी उसके अनुसार छत्रपति शिवाजी स्टेशन के पास का ब्रिज दुरुस्त था. लेकिन अब इस पुल के टूटने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि पुल सही हालत में था तो हादसा क्यों हुआ और ऑडिट रिपोर्ट में ग़लत जानकारी क्यों दी गई.
मुख्यमंत्री ने उच्चस्तरीय जांच में ये पता करने के आदेश भी दिए हैं कि ऑडिट रिपोर्ट किसने और कैसे बनाई. साथ ही उन्होंने कड़े कदम उठाने की बात भी की है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हादसे पर दुख जताते हुए ट्विटर पर लिखा है, "मेरी संवेदना पीड़ित परिवारों के साथ है और उम्मीद है कि हादसे में में घायल हुए लोग जल्द स्वस्थ होंगे. महाराष्ट्र सरकार पीड़ितों की मदद की हरसंभव कोशिश कर रही है."
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने लिखा है कि कि रेलवे के डॉक्टर और अधिकारी राहत और बचाव कार्य में बीएमसी के अधिकारियों की मदद कर रहे हैं.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हादसे की ख़बर पर अफसोस जताया है और ट्विटर पर लिखा है कि उनकी संवेदना मृतकों के परिजनों के साथ हैं.
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि "मोदी सरकार और महाराष्ट्र सरकार के दौर में कई हादसे हुए हैं- एल्फिन्स्टन में पैदल पार पुल में भगदड़, अंधेरी में बीते साल जुलाई में पुल गिरा था. रेलवे मंत्रालय के ऑडिट के दावे बार-बार ग़लत साबित हो रहे हैं. रेलवे मंत्री को इस्तीफ़ा देना चाहिए, या फिर उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए."
समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ट्वीट किया है, "मुंबई में पुल गिरने की बड़ी दुर्घटनाएं लगातार हो रहीं हैं. सरकार पुलों के सेफ़्टी ऑडिट को गंभीरता से नहीं ले रही है."
Monday, March 11, 2019
रेज़ांग ला की वो लड़ाई जहां 113 भारतीय सैनिकों की हुई थी मौत: विवेचना
बात फ़रवरी 1963 की है. चीन से लड़ाई ख़त्म होने के तीन महीने बाद एक लद्दाख़ी गड़ेरिया भटकता हुआ चुशूल से रेज़ांग ला जा पहुंचा. एकदम से उसकी निगाह तबाह हुए बंकरों और इस्तेमाल की गई गोलियों के खोलों पर पड़ी. वो और पास गया तो उसने देखा कि वहाँ चारों तरफ़ लाशें ही लाशें पड़ी थीं.... वर्दी वाले सैनिकों की लाशें.
जानीमानी सैनिक इतिहासकार और भारतीय सेना के परमवीर चक्र विजेताओं पर मशहूर किताब 'द ब्रेव' लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, 'वो गड़ेरिया भागता हुआ नीचे आया और उसने भारतीय सेना की एक चौकी पर इसकी सूचना दी. जब सैनिक वहाँ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि हर मृत भारतीय सैनिक के शरीर पर गोलियों के कई-कई ज़ख्म थे. कई अभी भी अपनी राइफ़लें थामे हुए थे. नर्सिंग असिस्टेंट के हाथ में सिरिंज और पट्टी का गोला था."
उन्होंने कहा, "किसी की राइफ़ल टूट कर उड़ चुकी थी, लेकिन उसका बट उसके हाथों में ही था. हुआ ये था कि लड़ाई ख़त्म होने के बाद वहाँ भारी हिमपात हो गया और उस इलाके को 'नो मैन्स लैंड' घोषित कर दिया गया. इसलिए वहाँ कोई जा नहीं पाया."
रचना बिष्ट कहती हैं, "लोगों को इनके बारे में पता ही नहीं था कि इन 113 लोगों के साथ हुआ क्या था. लोगों को यहाँ तक अंदेशा था कि वो युद्धबंदी बन गए हैं. तब तक इनके नाम के आगे एक तरह का बट्टा लग गया था. उनको कायर क़रार कर दिया गया था. उनके बारे में मशहूर हो गया था कि वो डर कर लड़ाई से भाग गए थे."
वो कहती हैं, "दो तीन लोग जो बच कर आए उनका लोगों ने हुक्का-पानी बंद कर दिया था. यहाँ तक कि उनके बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया गया. एक एनजीओ को बहुत बड़ा अभियान चलाना पड़ा कि वास्तव में ये लोग हीरो थे, कायर नहीं थे."
1962 में 13 कुमाऊँ को चुशूल हवाईपट्टी की रक्षा के लिए भेजा गया था. उसके अधिकतर जवान हरियाणा से थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी बर्फ़ गिरते देखी ही नहीं थी. उन्हें दो दिन के नोटिस पर जम्मू कश्मीर के बारामूला से वहाँ लाया गया था. उन्हें ऊँचाई और सर्दी में ढ़लने का मौका ही नहीं मिल पाया था. उनके पास शून्य से कई डिग्री कम तापमान की सर्दी के लिए न तो ढ़ंग के कपड़े थे और न जूते. उन्हें पहनने के लिए जर्सियाँ, सूती पतलूनें और हल्के कोट दिए गए थे.
मेजर शैतान सिंह ने अपने जवानों को पहाड़ी के सामने की ढलान पर तैनात कर दिया था. 18 नवंबर, 1962 को रविवार का दिन था. ठंड रोज़ की बनिस्बत कुछ ज़्यादा पड़ रही थी और रेज़ांग ला में बर्फ़ भी गिर रही थी.
उस लड़ाई में ज़िंदा बच निकलने वाले ऑनरेरी कैप्टेन सूबेदार राम चंद्र यादव जो आजकल रेवाड़ी में रहते हैं, याद करते हैं, "तड़के साढ़े तीन बजे अचानक एक लंबा बर्स्ट आया ड-ड-ड-ड-ड. पूरा पहाड़ी इलाका उसके शोर से गूंज गया. मैंने मेजर शैतान सिंह को बताया कि 8 प्लाटून के सामने से फ़ायर आया है. चार मिनट बाद हरि राम का फ़ोन आया कि 8-10 चीनी सिपाही हमारी तरफ़ बढ़ रहे थे."
वो कहते हैं, "जैसे ही वो हमारी रेंज में आए, हमारे जवानों ने लंबा बर्स्ट फ़ायर किया है. उस में चार-पांच चीनी तो उसी समय ख़त्म हो गए और बाकी वापस भाग गए. इसके बाद मैंने अपनी लाइट मशीन गन को मोर्चे के अंदर वापस बुला लिया है. ये सुन कर मेजर साहब ने कहा कि जिस समय का हमें इंतज़ार था, वो आ पहुंचा है. हरि राम ने कहा आप चिंता मत करिए. हम सब जवान तैयार हैं. हमने मोर्चा पकड़ लिया है."
7 पलटन के जमादार सुरजा राम ने अपने कंपनी कमांडर को इत्तला दी कि चीन के क़रीब 400 सैनिक उनकी पोस्ट की तरफ़ बढ़ रहे हैं. तभी 8 पलटन ने भी रिपोर्ट किया कि रिज की तरफ़ से करीब 800 चीनी सैनिक भी उनकी तरफ़ बढ़ रहे हैं.
मेजर शैतान सिंह ने आदेश दिया कि जैसे ही चीनी उन की फ़ायरिंग रेंज में आएं, उन पर फ़ायरिंग शुरू कर दी जाए.
सूबेदार राम चंद्र यादव बताते हैं, "जब चीनी 300 गज़ की रेंज में आए तो हमने उन पर फ़ायर खोल दिया. क़रीब 10 मिनट तक भारी फ़ायरिंग होती रही. मेजर शैतान सिंह बार बार बाहर निकल जाते थे. मैं उन्हें आगाह कर रहा था कि बाहर मत जाइए क्योंकि कोई भरोसा नहीं कि चीनियों की कब 'शेलिंग' आ जाए."
वो कहते हैं, "सुरजा राम ने रेडियो पर बताया कि हमने चीनियों को वापस भगा दिया है. हमारे सारे जवान सुरक्षित हैं. उन्हें कोई चोट नहीं लगी है. हम ऊँचाई पर थे और चीनी नीचे से आ रहे थे. ये बात हो ही रही थी कि चीनियों का पहला गोला हमारे बंकर पर आ कर गिरा. मेजर शैतान सिंह ने फ़ौरन फ़ायरिंग रुकवा दी. फिर उन्होंने 3 इंच मोर्टार चलाने वालों को कोडवर्ड में आदेश दिया 'टारगेट तोता.' हमारे मोर्टार के गोलों से चीनी घबरा गए और ये हमला भी नाकाम हो गया."
जब चीनियों द्वारा सामने से किए गए सारे हमले नाकामयाब हो गए तो उन्होंने अपनी योजना बदल डाली. सुबह साढ़े चार बजे उन्होंने सभी चौकियों पर एक साथ गोले बरसाने शुरू कर दिए. 15 मिनट में सब कुछ ख़त्म हो गया. हर तरफ़ मौत और तबाही का मंज़र था.
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "पहला हमला उन्होंने नाकामयाब कर दिया था. ढलान के इधर-उधर चीनियों की लाशें पड़ी हुई थीं जो उन्हें ऊपर से दिखाई दे रही थीं. लेकिन फिर चीनियों ने मोर्टर फ़ायरिंग शुरू कर दी. ये हमला 15 मिनट तक चला होगा."
वो कहती हैं, "भारतीय जवानों के पास सिर्फ़ लाइट मशीन गन्स और .303 की राइफ़ले थीं जो कि 'सिंगिल लोड' थी. यानी हर गोली चलाने के बाद उन्हें फिर से 'लोड' करना पड़ता था. इतनी सर्दी थी कि जवानों की उंगलियाँ जम गई थीं."
जानीमानी सैनिक इतिहासकार और भारतीय सेना के परमवीर चक्र विजेताओं पर मशहूर किताब 'द ब्रेव' लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, 'वो गड़ेरिया भागता हुआ नीचे आया और उसने भारतीय सेना की एक चौकी पर इसकी सूचना दी. जब सैनिक वहाँ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि हर मृत भारतीय सैनिक के शरीर पर गोलियों के कई-कई ज़ख्म थे. कई अभी भी अपनी राइफ़लें थामे हुए थे. नर्सिंग असिस्टेंट के हाथ में सिरिंज और पट्टी का गोला था."
उन्होंने कहा, "किसी की राइफ़ल टूट कर उड़ चुकी थी, लेकिन उसका बट उसके हाथों में ही था. हुआ ये था कि लड़ाई ख़त्म होने के बाद वहाँ भारी हिमपात हो गया और उस इलाके को 'नो मैन्स लैंड' घोषित कर दिया गया. इसलिए वहाँ कोई जा नहीं पाया."
रचना बिष्ट कहती हैं, "लोगों को इनके बारे में पता ही नहीं था कि इन 113 लोगों के साथ हुआ क्या था. लोगों को यहाँ तक अंदेशा था कि वो युद्धबंदी बन गए हैं. तब तक इनके नाम के आगे एक तरह का बट्टा लग गया था. उनको कायर क़रार कर दिया गया था. उनके बारे में मशहूर हो गया था कि वो डर कर लड़ाई से भाग गए थे."
वो कहती हैं, "दो तीन लोग जो बच कर आए उनका लोगों ने हुक्का-पानी बंद कर दिया था. यहाँ तक कि उनके बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया गया. एक एनजीओ को बहुत बड़ा अभियान चलाना पड़ा कि वास्तव में ये लोग हीरो थे, कायर नहीं थे."
1962 में 13 कुमाऊँ को चुशूल हवाईपट्टी की रक्षा के लिए भेजा गया था. उसके अधिकतर जवान हरियाणा से थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी बर्फ़ गिरते देखी ही नहीं थी. उन्हें दो दिन के नोटिस पर जम्मू कश्मीर के बारामूला से वहाँ लाया गया था. उन्हें ऊँचाई और सर्दी में ढ़लने का मौका ही नहीं मिल पाया था. उनके पास शून्य से कई डिग्री कम तापमान की सर्दी के लिए न तो ढ़ंग के कपड़े थे और न जूते. उन्हें पहनने के लिए जर्सियाँ, सूती पतलूनें और हल्के कोट दिए गए थे.
मेजर शैतान सिंह ने अपने जवानों को पहाड़ी के सामने की ढलान पर तैनात कर दिया था. 18 नवंबर, 1962 को रविवार का दिन था. ठंड रोज़ की बनिस्बत कुछ ज़्यादा पड़ रही थी और रेज़ांग ला में बर्फ़ भी गिर रही थी.
उस लड़ाई में ज़िंदा बच निकलने वाले ऑनरेरी कैप्टेन सूबेदार राम चंद्र यादव जो आजकल रेवाड़ी में रहते हैं, याद करते हैं, "तड़के साढ़े तीन बजे अचानक एक लंबा बर्स्ट आया ड-ड-ड-ड-ड. पूरा पहाड़ी इलाका उसके शोर से गूंज गया. मैंने मेजर शैतान सिंह को बताया कि 8 प्लाटून के सामने से फ़ायर आया है. चार मिनट बाद हरि राम का फ़ोन आया कि 8-10 चीनी सिपाही हमारी तरफ़ बढ़ रहे थे."
वो कहते हैं, "जैसे ही वो हमारी रेंज में आए, हमारे जवानों ने लंबा बर्स्ट फ़ायर किया है. उस में चार-पांच चीनी तो उसी समय ख़त्म हो गए और बाकी वापस भाग गए. इसके बाद मैंने अपनी लाइट मशीन गन को मोर्चे के अंदर वापस बुला लिया है. ये सुन कर मेजर साहब ने कहा कि जिस समय का हमें इंतज़ार था, वो आ पहुंचा है. हरि राम ने कहा आप चिंता मत करिए. हम सब जवान तैयार हैं. हमने मोर्चा पकड़ लिया है."
7 पलटन के जमादार सुरजा राम ने अपने कंपनी कमांडर को इत्तला दी कि चीन के क़रीब 400 सैनिक उनकी पोस्ट की तरफ़ बढ़ रहे हैं. तभी 8 पलटन ने भी रिपोर्ट किया कि रिज की तरफ़ से करीब 800 चीनी सैनिक भी उनकी तरफ़ बढ़ रहे हैं.
मेजर शैतान सिंह ने आदेश दिया कि जैसे ही चीनी उन की फ़ायरिंग रेंज में आएं, उन पर फ़ायरिंग शुरू कर दी जाए.
सूबेदार राम चंद्र यादव बताते हैं, "जब चीनी 300 गज़ की रेंज में आए तो हमने उन पर फ़ायर खोल दिया. क़रीब 10 मिनट तक भारी फ़ायरिंग होती रही. मेजर शैतान सिंह बार बार बाहर निकल जाते थे. मैं उन्हें आगाह कर रहा था कि बाहर मत जाइए क्योंकि कोई भरोसा नहीं कि चीनियों की कब 'शेलिंग' आ जाए."
वो कहते हैं, "सुरजा राम ने रेडियो पर बताया कि हमने चीनियों को वापस भगा दिया है. हमारे सारे जवान सुरक्षित हैं. उन्हें कोई चोट नहीं लगी है. हम ऊँचाई पर थे और चीनी नीचे से आ रहे थे. ये बात हो ही रही थी कि चीनियों का पहला गोला हमारे बंकर पर आ कर गिरा. मेजर शैतान सिंह ने फ़ौरन फ़ायरिंग रुकवा दी. फिर उन्होंने 3 इंच मोर्टार चलाने वालों को कोडवर्ड में आदेश दिया 'टारगेट तोता.' हमारे मोर्टार के गोलों से चीनी घबरा गए और ये हमला भी नाकाम हो गया."
जब चीनियों द्वारा सामने से किए गए सारे हमले नाकामयाब हो गए तो उन्होंने अपनी योजना बदल डाली. सुबह साढ़े चार बजे उन्होंने सभी चौकियों पर एक साथ गोले बरसाने शुरू कर दिए. 15 मिनट में सब कुछ ख़त्म हो गया. हर तरफ़ मौत और तबाही का मंज़र था.
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "पहला हमला उन्होंने नाकामयाब कर दिया था. ढलान के इधर-उधर चीनियों की लाशें पड़ी हुई थीं जो उन्हें ऊपर से दिखाई दे रही थीं. लेकिन फिर चीनियों ने मोर्टर फ़ायरिंग शुरू कर दी. ये हमला 15 मिनट तक चला होगा."
वो कहती हैं, "भारतीय जवानों के पास सिर्फ़ लाइट मशीन गन्स और .303 की राइफ़ले थीं जो कि 'सिंगिल लोड' थी. यानी हर गोली चलाने के बाद उन्हें फिर से 'लोड' करना पड़ता था. इतनी सर्दी थी कि जवानों की उंगलियाँ जम गई थीं."
Tuesday, March 5, 2019
अमेठी की ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री पर सच कौन बोल रहा है-पीएम मोदी या राहुल गांधी
अमेठी के ज़िला मुख्यालय गौरीगंज से क़रीब 12 किमी. दूर कोरवा गांव में हिन्दुस्तान एअरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल की इकाई है. इसी के बड़े से कैंपस के भीतर रक्षा उत्पादों और उपकरणों को बनाने की एक फ़ैक्ट्री है, जिसका नाम है आयुध निर्माणी प्रोजेक्ट कोरवा.
यूं तो इस ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री का साल 2007 में ही शिलान्यास हुआ था और पिछले क़रीब छह साल से यहां उत्पादन भी शुरू हो चुका है लेकिन रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब इस फ़ैक्ट्री को लेकर पिछली यूपीए सरकार और अमेठी से सांसद राहुल गांधी पर तंज़ कसा तो ये फ़ैक्ट्री फिर चर्चा में आ गई.
प्रधानमंत्री ने कोरवा से क़रीब पंद्रह किलोमीटर दूर अमेठी की रैली में कहा, "जिस फ़ैक्ट्री में साल 2010 से काम शुरू हो जाना चाहिए था, तब तक उसकी बिल्डिंग लटकी रही. 2013 में जैसे-तैसे काम शुरू भी हुआ, लेकिन आधुनिक राइफ़ल तब भी नहीं बनी."
लेकिन, सभा में मौजूद रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण तो यहां तक कह गईं, "रूस के सहयोग से अत्याधुनिक एके 203 गन हम कोरवा के जिस ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री में बनाने जा रहे हैं, वह फ़ैक्ट्री बीस-तीस साल से ऐसे ही पड़ी है, वहां कुछ भी काम नहीं हो रहा है."
प्रधानमंत्री इस रैली में इंडो-रूस राइफ़ल प्राइवेट लिमिटेड के संयुक्त उपक्रम की शुरुआत कर रहे थे जिसके तहत अत्याधुनिक एके 203 राइफ़ल्स का निर्माण भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के विभाग आयुध निर्माणी बोर्ड और रूस की दो कंपनियों रोसोबोरोन एक्सपर्ट और कंसर्न कलाश्निकोव के सहयोग से किया जाएगा.
पूरा निर्माण कार्य उसी ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री में होगा जो साल 2013 से रक्षा उपकरण और अत्याधुनिक राइफ़लें बना रही है.
यूनिट के प्रभारी अधिकारी एससी पांडेय ने बीबीसी को बताया, "साल 2007 में इस यूनिट की स्थापना सेना के लिए कार्बाइन गन्स बनाने के लिए हुई थी. साल 2013 से ही यहां हम यहां पंप एक्शन गन यानी पीएजी और रक्षा संबंधी दूसरे उपकरणों का निर्माण कर रहे हैं."
"अब यहां उन्नत श्रेणी की एके 203 राइफ़ल्स बनाई जाएंगी. इसके लिए ज़्यादातर संयंत्र और मशीनें यूनिट में पहले से ही उपलब्ध हैं. रूसी कंपनियों से हमें और उन्नत तकनीक मिलेगी."
एससी पांडेय के मुताबिक़, यहां बनी हुई पीएजी राइफ़ल्स उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल की पुलिस न सिर्फ़ इस्तेमाल कर रही हैं बल्कि पिछले वित्तीय वर्ष में इकाई को 17 करोड़ रुपये का राजस्व यानी वैल्यू ऑफ़ इश्यू भी मिला है. उनके मुताबिक, अन्य सालों में भी इसी तरह राजस्व की प्राप्ति हुई है.
दरअसल, प्रधानमंत्री ने जिस तरीक़े से इस परियोजना को अपनी सरकार की उपलब्धि बताया और कांग्रेस पार्टी को सैन्य उपकरणों के प्रति उदासीन बताते हुए घेरने की कोशिश की, उससे कांग्रेस पार्टी में खलबली मच गई.
ख़ुद राहुल गांधी ने बेहद कड़े शब्दों में ट्वीट करके प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि अमेठी में ये फ़ैक्ट्री पहले से ही और बंदूकें बना भी रही है, जिसका उद्घाटन उन्होंने ख़ुद किया था.
राहुल गांधी अमेठी से लगातार तीसरी बार सांसद हैं. अमेठी में उनके प्रतिनिधि चंद्रकात दुबे कहते हैं, "प्रधानमंत्री को तो राहुल गांधी और यूपीए सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्हें बना-बनाया इंफ़्रास्ट्रक्चर मिल गया, जहां कितनी भी अत्याधुनिक राइफ़ल या अन्य रक्षा उपकरण बना सकते हैं."
"सरकार ने नया कुछ नहीं किया है, सिवाए इसके कि रक्षा उपकरणों के निर्माण में निजी क्षेत्र, वो भी विदेशी कंपनी को अनुमति दे दी है. बाक़ी सब यहां पहले से ही मौजूद थीं और काम कर रही थीं."
वहीं रक्षा मंत्री ने भले ही ये कहा हो कि कारखाना वर्षों से बेकार पड़ा है लकिन वास्तविकता ये है कि इस कारखाने में ए और बी श्रेणी के अधिकारियों समेत दो सौ से ज़्यादा स्थाई और इतने ही अस्थाई कर्मचारी काम कर रहे हैं.
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक़, इस यूनिट का लक्ष्य शुरुआत में 45 हज़ार कार्बाइन गन्स हर साल बनाने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि सेना ये तय ही नहीं कर पाई कि उसे किस गुणवत्ता की कार्बाइन चाहिए.
जानकारों के मुताबिक़, रक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाले विभाग ओफ़बी यानी ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री बोर्ड के अधीन देश भर में आज कुल 41 ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्रियां हैं और ये बोर्ड ही तय करता है कि किस फ़ैक्ट्री में क्या बनना है. इनमें से चार यूनिट्स ऐसी हैं जिनमें छोटे हथियार और उपकरण बनते हैं.
बताया जा रहा है कि भारत सरकार की 'मेक इन इंडिया' नीति के तहत संयुक्त उपक्रम का गठन किया गया है. इसके तहत 7.5 लाख राइफ़लों का उत्पादन किया जाएगा. इन राइफ़लों की आपूर्ति तीनों सेनाओं और एवं केंद्रीय सुरक्षा बलों की जाएगी. यह राइफ़ल विकास के साथ धीरे-धीरे पूरी तरह से स्वदेशी हो जाएगा.
लेकिन ये आशंका भी जताई जा रही है कि रूसी कंपनी एके 203 से जुड़े सारे छोटे उपकरण यहां लाएगी और इस यूनिट में उन्हें सिर्फ़ जोड़ा जाएगा यानी केवल असेंबलिंग का काम होगा.
रक्षा मंत्रालय के ऑर्डनेंस विभाग के ही एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि रूसी कंपनियों की ओर से भारत को किसी तरह की तकनीक का हस्तांतरण नहीं किया जाएगा.
यूं तो इस ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री का साल 2007 में ही शिलान्यास हुआ था और पिछले क़रीब छह साल से यहां उत्पादन भी शुरू हो चुका है लेकिन रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब इस फ़ैक्ट्री को लेकर पिछली यूपीए सरकार और अमेठी से सांसद राहुल गांधी पर तंज़ कसा तो ये फ़ैक्ट्री फिर चर्चा में आ गई.
प्रधानमंत्री ने कोरवा से क़रीब पंद्रह किलोमीटर दूर अमेठी की रैली में कहा, "जिस फ़ैक्ट्री में साल 2010 से काम शुरू हो जाना चाहिए था, तब तक उसकी बिल्डिंग लटकी रही. 2013 में जैसे-तैसे काम शुरू भी हुआ, लेकिन आधुनिक राइफ़ल तब भी नहीं बनी."
लेकिन, सभा में मौजूद रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण तो यहां तक कह गईं, "रूस के सहयोग से अत्याधुनिक एके 203 गन हम कोरवा के जिस ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री में बनाने जा रहे हैं, वह फ़ैक्ट्री बीस-तीस साल से ऐसे ही पड़ी है, वहां कुछ भी काम नहीं हो रहा है."
प्रधानमंत्री इस रैली में इंडो-रूस राइफ़ल प्राइवेट लिमिटेड के संयुक्त उपक्रम की शुरुआत कर रहे थे जिसके तहत अत्याधुनिक एके 203 राइफ़ल्स का निर्माण भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के विभाग आयुध निर्माणी बोर्ड और रूस की दो कंपनियों रोसोबोरोन एक्सपर्ट और कंसर्न कलाश्निकोव के सहयोग से किया जाएगा.
पूरा निर्माण कार्य उसी ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री में होगा जो साल 2013 से रक्षा उपकरण और अत्याधुनिक राइफ़लें बना रही है.
यूनिट के प्रभारी अधिकारी एससी पांडेय ने बीबीसी को बताया, "साल 2007 में इस यूनिट की स्थापना सेना के लिए कार्बाइन गन्स बनाने के लिए हुई थी. साल 2013 से ही यहां हम यहां पंप एक्शन गन यानी पीएजी और रक्षा संबंधी दूसरे उपकरणों का निर्माण कर रहे हैं."
"अब यहां उन्नत श्रेणी की एके 203 राइफ़ल्स बनाई जाएंगी. इसके लिए ज़्यादातर संयंत्र और मशीनें यूनिट में पहले से ही उपलब्ध हैं. रूसी कंपनियों से हमें और उन्नत तकनीक मिलेगी."
एससी पांडेय के मुताबिक़, यहां बनी हुई पीएजी राइफ़ल्स उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल की पुलिस न सिर्फ़ इस्तेमाल कर रही हैं बल्कि पिछले वित्तीय वर्ष में इकाई को 17 करोड़ रुपये का राजस्व यानी वैल्यू ऑफ़ इश्यू भी मिला है. उनके मुताबिक, अन्य सालों में भी इसी तरह राजस्व की प्राप्ति हुई है.
दरअसल, प्रधानमंत्री ने जिस तरीक़े से इस परियोजना को अपनी सरकार की उपलब्धि बताया और कांग्रेस पार्टी को सैन्य उपकरणों के प्रति उदासीन बताते हुए घेरने की कोशिश की, उससे कांग्रेस पार्टी में खलबली मच गई.
ख़ुद राहुल गांधी ने बेहद कड़े शब्दों में ट्वीट करके प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि अमेठी में ये फ़ैक्ट्री पहले से ही और बंदूकें बना भी रही है, जिसका उद्घाटन उन्होंने ख़ुद किया था.
राहुल गांधी अमेठी से लगातार तीसरी बार सांसद हैं. अमेठी में उनके प्रतिनिधि चंद्रकात दुबे कहते हैं, "प्रधानमंत्री को तो राहुल गांधी और यूपीए सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्हें बना-बनाया इंफ़्रास्ट्रक्चर मिल गया, जहां कितनी भी अत्याधुनिक राइफ़ल या अन्य रक्षा उपकरण बना सकते हैं."
"सरकार ने नया कुछ नहीं किया है, सिवाए इसके कि रक्षा उपकरणों के निर्माण में निजी क्षेत्र, वो भी विदेशी कंपनी को अनुमति दे दी है. बाक़ी सब यहां पहले से ही मौजूद थीं और काम कर रही थीं."
वहीं रक्षा मंत्री ने भले ही ये कहा हो कि कारखाना वर्षों से बेकार पड़ा है लकिन वास्तविकता ये है कि इस कारखाने में ए और बी श्रेणी के अधिकारियों समेत दो सौ से ज़्यादा स्थाई और इतने ही अस्थाई कर्मचारी काम कर रहे हैं.
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक़, इस यूनिट का लक्ष्य शुरुआत में 45 हज़ार कार्बाइन गन्स हर साल बनाने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि सेना ये तय ही नहीं कर पाई कि उसे किस गुणवत्ता की कार्बाइन चाहिए.
जानकारों के मुताबिक़, रक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाले विभाग ओफ़बी यानी ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री बोर्ड के अधीन देश भर में आज कुल 41 ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्रियां हैं और ये बोर्ड ही तय करता है कि किस फ़ैक्ट्री में क्या बनना है. इनमें से चार यूनिट्स ऐसी हैं जिनमें छोटे हथियार और उपकरण बनते हैं.
बताया जा रहा है कि भारत सरकार की 'मेक इन इंडिया' नीति के तहत संयुक्त उपक्रम का गठन किया गया है. इसके तहत 7.5 लाख राइफ़लों का उत्पादन किया जाएगा. इन राइफ़लों की आपूर्ति तीनों सेनाओं और एवं केंद्रीय सुरक्षा बलों की जाएगी. यह राइफ़ल विकास के साथ धीरे-धीरे पूरी तरह से स्वदेशी हो जाएगा.
लेकिन ये आशंका भी जताई जा रही है कि रूसी कंपनी एके 203 से जुड़े सारे छोटे उपकरण यहां लाएगी और इस यूनिट में उन्हें सिर्फ़ जोड़ा जाएगा यानी केवल असेंबलिंग का काम होगा.
रक्षा मंत्रालय के ऑर्डनेंस विभाग के ही एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि रूसी कंपनियों की ओर से भारत को किसी तरह की तकनीक का हस्तांतरण नहीं किया जाएगा.
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