पिछले साल जापान ने एलान किया कि वो फिर से व्हेलों का शिकार शुरू करेगा. अस्सी के दशक में दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर व्हेलों के शिकार पर पाबंदी का फ़ैसला किया था. वजह ये थी कि बेतरह शिकार के चलते व्हेलों की कई नस्लें ख़ात्मे के कगार पर थीं.
यूं तो व्हेलों का शिकार आदि काल से समुद्र तट के किनारे रहने वाले करते आए थे. मगर, पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति के बाद व्हेलों को मारने में बड़ी तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ था. वजह ये कि उनका मांस और व्हेलों के शरीर में मौजूद फैट से निकलने वाला तेल कारख़ानों में इस्तेमाल होता था.
अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में सुदूर दक्षिण में व्हेलों के शिकार का ठिकाना एक ऐसा द्वीप बना, जहां इंसान का नामो-निशान नहीं था.
दक्षिणी अटलांटिक महासागर में अंटार्कटिका महाद्वीप के क़रीब है साउथ जॉर्जिया नाम का द्वीप. हज़ारों बरस से सील, वॉलरस और व्हेलें इस द्वीप पर आती-जाती रही थीं.
पहाड़ों, ग्लेशियरों और क़ुदरती बंदरगाहों से लैस ये द्वीप इंसानों से लंबे वक़्त तक अछूता रहा था. यहां से सबसे क़रीबी इंसानी बस्ती है फॉकलैंड द्वीप समूह. वो भी 1400 किलोमीटर दूर है.
इस द्वीप की खोज तो 1675 में हो चुकी थी. पर, ब्रिटिश अन्वेषक कैप्टन जेम्स कुक ने 1775 में साउथ जॉर्जिया पर ब्रिटेन का झंडा फहराकर इसे ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा घोषित कर दिया. यहां से लौट कर जेम्स कुक ने साउथ जॉर्जिया के बारे में विस्तार से लिखा.
कुक ने बताया कि किस तरह इस द्वीप पर भारी तादाद में सील आकर रहती हैं. इसके बाद अमरीका और ब्रिटेन में सील के शिकार में दिलचस्पी रखने वालों ने इस द्वीप की तरफ़ कूच कर दिया. एक सदी के भीतर ही हालात ऐसे हो गए कि यहां पायी जाने वाली फर सील की नस्ल शिकार की वजह से पूरी तरह ख़त्म होने की स्थिति में पहुंच गई.
अच्छी बात ये रही कि बीसवीं सदी की शुरुआत होते-होते सीलों का शिकार फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया था. तो, लालची शिकारियों ने बची-खुची सील को बख़्श दिया.
मगर, दक्षिणी जॉर्जिया के ख़ूनी शिकार के इतिहास का सिलसिला यहां नहीं थमा. जल्द ही एक और ख़ूनी शिकार ने इसकी जगह ले ली.
1916 में अर्नेस्ट शैकल्टन नाम का एक शिकारी नाविक अंटार्कटिका के एलीफैंट द्वीप पर फंस गया था. बर्फ़ीले तूफ़ान और ग्लेशियर के थपेड़ों से उसका जहाज़ टूट गया. तमाम मुश्किलें झेलते हुए शैकल्टन बमुश्किल साउथ जॉर्जिया पहुंचा.
सील की हत्या का ये ठिकाना, उसके लिए जीवन का वरदान बन गया. ऐसा लगा कि वो किसी दूसरी दुनिया से इंसानी सभ्यता के ठिकाने पर पहुंच गया है.
जब शैकल्टन साउथ जॉर्जिया पहुंचा, तो पूरे द्वीप पर सील के शिकार और उसके बाद, काट-छांट कर उनका मांस और ब्लबर यानी फैट निकालने के औज़ार बिखरे पड़े थे. आरियां थीं, कारख़ाने थे. व्हेल और सील के लगातार शिकार की वजह से इस द्वीप से ख़ून की धाराएं निकल कर समुद्र में मिलते हुए साफ़ दिखती थीं. एक दौर ऐसा था कि इस द्वीप पर दसियों हज़ार व्हेलों का क़त्ल किया गया था.
असल में 1902 में कार्ल एंटन लार्सेन नाम का नार्वे का नाविक ध्रुवों की खोज में यहां तक पहुंचा था. यहां उसने सील के शिकार के लिए लगे तीन पैरों वाले बर्तन जैसे औज़ार को देखकर इसका नाम ग्रित्विकेन यानी बर्तन वाली गुफ़ा नाम दे दिया.
यहां उस वक़्त व्हेलें अक्सर आकर अपना ठिकाना बनाती थीं. तभी कार्ल एंटन ने इसे व्हेलों के शिकार के लिए सबसे मुफ़ीद जगह बताई. 1904 में कार्ल एंटन यहां दोबारा आया. तब उसने यहां पर व्हेलों के शिकार का पहला कारख़ाना बनाया. अगले 8 साल में यानी 1912 तक यहां व्हेलों के शिकार के 6 और कारख़ाने खुल गए थे.
पोलर लैटीट्यूड नाम के क्रूज़ शिप पर इतिहासकार सेब कोल्थार्ड कहते हैं कि साउथ जॉर्जिया पर किंग पेंगुइन भी भारी तादाद में रहते हैं. इसके अलावा कई और ख़ास जीव भी धरती के इस दुरूह हिस्से की पहचान हैं.
आज की तारीख़ में पूरे साल भर में क़रीब 18 हज़ार लोग साउथ जॉर्जिया आते हैं. इनमें से ज़्यादातर यहां के ख़ूनी इतिहास के पन्ने खंगालने आते हैं.
साउथ जॉर्जिया द्वीप 3755 वर्ग किलोमीटर में फैला है. जज़ीरे का आधा से ज़्यादा हिस्सा पूरे साल बर्फ़ से ढका रहता है. हालांकि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से यहां के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं.
आज ये द्वीप दुनिया से भले अलग-थलग हो, एक ज़माने में ये विश्व की अर्थव्यवस्था में अहम रोल निभाता था.
सैलानियों को लुभाने के लिए साउथ जॉर्जिया में व्हेलों के शिकार के बाद उनसे मांस और तेल निकालने वाले पुराने कारख़ाने अब म्यूज़ियम बना दिए गए हैं.
इसके एक बंदरगाह पर व्हेल के शिकार में इस्तेमाल होने वाला पुराना जहाज़ पेट्रेल खड़ा है. एक दौर ऐसा भी था, जब ये जहाज़ एक दिन में 15 व्हेलों का शिकार कर लेता था. इन्हें साउथ जॉर्जिया लाया जाता था.
जहां शिकार की हुई व्हेलों का मांस और तेल निकाला जाता था. जहां इन्हें रखा जाता था, वो जगह तेल और ख़ून की वजह से बहुत फिसलन भरी हो जाती थी. इसलिए शिकारी ऐसे बूट पहनते थे, जिनके तलवों में नाख़ून लगे होते थे.
पहले तो व्हेलों से केवल उनका फैट वाला हिस्सा ही निकाला जाता था, जिसे ब्लबर कहते थे. हालांकि बाद में व्हेलों का मांस और उनकी हड्डियां भी काम में लायी जाने लगी थीं.
व्हेल से निकला अव्वल दर्जे का तेल आइसक्रीम या मार्जरीन बनाने के काम आता था. दूसरे दर्जे का तेल साबुन और कॉस्मेटिक बनाने में प्रयोग किया जाता था. और, सबसे ख़राब तेल कारख़ानों में इस्तेमाल होता था.
व्हेल के तेल से ग्लिसरॉल, विस्फोटक और राइफ़लों में डालने का तेल तैयार होता था. इसके अलावा इनसे क्रोनोमीटर और दूसरे हथियार भी बनाए जाते थे.
पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान व्हेलों के तेल की भारी मांग रही. नतीजा ये हुआ कि व्हेलों का बेतहाशा शिकार हुआ.
एक दौर ऐसा भी था कि साउथ जॉर्जिया में व्हेल के शिकार के लिए 450 या इससे भी ज़्यादा लोग रहा करते थे. वो हफ़्ते के सातों दिन लगातार कम करते थे. वो भी शून्य से भी 10 डिग्री सेल्सियस नीचे के तापमान में.
द्वीप पर एक चर्च भी है. जिसके पादरी का काम सबसे बोरिंग था. क्योंकि उसके पास इसके सिवा कोई काम नहीं होता था.
द्वीप पर खुली किराने की दुकान में तंबाकू ख़ूब बेची जाती थी. लोगों को पीने के लिए शराब नहीं मिलती थी. इसका नतीजा ये हुआ कि लोग कोलोन पीकर गुज़ारा करते थे. कई लोग पॉलिश को निचोड़कर शराब की प्यास बुझाते थे. क्योंकि उसमें अल्कोहल होता है.
1904 से 1905 के बीच साउथ जॉर्जिया में 1 लाख 75 हज़ार 250 व्हेलों को मारकर उनसे तेल निकाला गया था. माना जाता है कि बहुत से जहाज़ तो व्हेलों को अपने डेक पर ही चीर-फाड़ डालते थे. एक मोटे अनुमान के मुताबिक़, 1904 से 1978 के बीच 15 लाख से ज़्यादा व्हेलों को मार डाला गया था. इसका नतीजा ये हुआ कि व्हेलों की आबादी में कमी महसूस की गई. कई नस्लें ख़तरे में पड़ गईं.
Friday, April 19, 2019
Monday, April 15, 2019
दक्षिण भारत का जलियांवाला बाग़, पुलिस फ़ायरिंग में मरे थे 32
"जलियांवाला बाग़ त्रासदी ने ब्रिटिश भारत के इतिहास पर एक अमिट दाग़ को छोड़ा है" - इस कड़वी सच्चाई को आज के ब्रिटिश शासक भी स्वीकार करते हैं. वैशाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था.
लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि दक्षिण भारत भी जलियांवाला बाग जैसी एक त्रासदी झेल चुका है.
उस दिन आंध्र प्रदेश के अनंतपुर की सीमा से सटे एक बग़ीचे में स्वतंत्रता सेनानियों का एक समूह इकट्ठा हुआ था.
वहां जुटे लोगों पर पुलिस ने गोलियां बरसाई थीं और 32 लोग काल के गाल में समा गए.
यह त्रासदी 25 अप्रैल 1938 को विदुरश्वत्था में हुई थी. यह जगह आज कर्नाटक के गौरीबिदानुर ज़िले में पड़ता है.
विदुरश्वत्था तब मैसूर रजवाड़े के कोलार का एक गांव था. उस दिन यहां की धरती 32 स्वतंत्रता सेनानियों के ख़ून से रंग गई थी.
उनकी शहादत ने मैसूर राज्य में आज़ादी के आंदोलन को और मज़बूती प्रदान की. ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर उतर आए और उनका यह संकल्प आज़ादी मिलने तक कायम रहा.
आज विदुरश्वत्था, कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से 90 किलोमीटर और आंध्र प्रदेश के हिंदूपुर से महज़ 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.
ब्रिटिश राज के अधीन मैसूर राज के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विदुरश्वत्था ने गांधी के मार्ग को अपनाया था.
यह वो समय था जब आज़ादी को लेकर कांग्रेस का संघर्ष अपने चरम पर था.
तब मैसूर राज ने आदेश पारित किया कि उनके अधिकार क्षेत्र में कोई भी राष्ट्र ध्वज नहीं फ़हराएगा. यह भी कहा गया कि जो झंडा फ़हराने की हिमाकत करेगा गोली मार कर उसकी जान ले ली जाएगी.
मैसूर राज के इस आदेश का विरोध करते हुए भोगराजू पट्टाभि सीतारमैया, केटी श्याम, हारदेकर, सिद्धालिंगैया, केसी रेड्डी, रामाचार जैसे तब के कांग्रेसी नेताओं ने मंड्या ज़िले के शिवपुरा में आयोजित होने वाली कांग्रेस की बैठक के दौरान राष्ट्रीय ध्वज को फ़हराने का फ़ैसला किया.
उनके इस फ़ैसले की जानकारी सरकार तक पहुंच गई और वहां पुलिस तैनात कर दी गई. शोधकर्ता गंगाधर मूर्ति और स्मिता रेड्डी ने अपनी किताब 'जलियांवाला बाग़ ऑफ़ कर्नाटक' में विदुरश्वत्था नरसंहार के बाद की घटनाओं पर विस्तार से लिखा है.
उसमें लिखा गया है कि तीन दिवसीय उस बैठक के दौरान जब कांग्रेसियों ने झंडा फ़हराने की कोशिश की तो ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.
शिवपुरा में उनके झंडा फहराने की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया, तो कांग्रेसी नेताओं ने 18 अप्रैल 1938 को विदुरश्वत्था में राष्ट्रीय ध्वज फ़हराने के लिए 'ध्वज सत्याग्रह' सभा का आयोजन किया.
चूंकि यह जगह आंध्र प्रदेश के क़रीब है तो सीमावर्ती नेताओं के यहां आने की उम्मीद थी. नेताओं ने कोलार ज़िले में घूम-घूमकर इस सभा का प्रचार किया.
मैसूर सरकार को उनकी इन गतिविधियों के बारे में सब पता था. उसने इस विदुरश्वत्था इलाक़े के दो किलोमीटर के दायरे में निषेधाज्ञा लगाकर किसी भी कार्यक्रम को आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया.
कांग्रेसी नेताओं ने रणनीतिक रूप से पहले चार दिनों में कोई भी गतिविधि नहीं की.
एन.सी. नागी रेड्डी के नेतृत्व में हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लिए नेताओं ने विदुरश्वत्था की ओर कूच किया.
रास्ते में उन्होंने लोगों को पर्चे बांटे और सरकार के आदेश को तोड़ते हुए उन्हें ध्वज सत्याग्रह में जुड़ने की अपील की. लोग उनके साथ जुड़े भी. वहीं, दूसरी ओर कल्लूरू सुब्बाराव के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश के लोग भी मार्च कर रहे थे.
हज़ारों लोगों ने विदुरश्वत्था की ओर कूच किया था जिसको पुलिस ने तितर-बितर भी किया. आख़िरकार कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के सत्याग्रही विदुरश्वत्था पहुंच गए और एक मंदिर के पीछे वाले बगीचे में इकट्ठा हुए.
नेताओं को जेल में डाला गया
पुलिस ने वहां पहुंचकर एन.सी. नागी रेड्डी और दूसरे नेताओं को गिरफ़्तार कर उन्हें चिकबल्लापुर कोर्ट में पेश किया. जज ने सरकार के नियम को तोड़ने के लिए नेताओं से माफ़ी मांगने के लिए कहा लेकिन उन्होंने माफ़ी नहीं मांगी जिसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया.
कोलार ज़िले में जब नेताओं के जेल में डाले जाने का लोगों को पता चला तो वह सड़कों पर उतर आओ और उन्होंने सरकार विरोधी प्रदर्शन किए.
इसके बाद विदुरश्वत्था में स्थिति तनावग्रस्त हो गई. बगीचे में इकट्ठा सभी सत्याग्रही ग़ुस्से से भरे हुए थे.
लोगों को नियंत्रण करना मुश्किल हो गया था जिसके बाद अतिरिक्त सुरक्षाबलों को वहां भेजा गया. वहां चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई. हालांकि वहां लोगों की संख्या लगातार बढ़ती रही.
पुलिस ने सत्याग्रहियों को बग़ीचे के एक कोने तक सीमित कर दिया और सभी आने-जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया.
नरसंहार का दिन
25 अप्रैल 1938 को गौरीबिदानुर और आसपास के गांवों से सुबह साढ़े दस बजे के क़रीब लोग पहुंचने लगे.
वहीं, तकरीबन 25 हज़ार लोग झंडा फ़हराने का इंतज़ार कर रहे थे. सत्याग्रहियों ने तय किया कि तय समय से पहले ही झंडा फ़हराया जाए लेकिन जैसे ही वे झंडा फ़हराने के लिए तैयार हुए पुलिस ने अपनी बंदूक़ें उनकी ओर मोड़ दीं.
लेकिन तब भी जब सत्याग्रही पीछे नहीं हटे तो पुलिस ने वेदुलवेनी सुरन्ना, नारायण स्वामी, कल्लूरू सुब्बाराव जैसे नेताओं को गिरफ़्तार कर वहां से हटा दिया.
उन नेताओं की गिरफ़्तारी ने लोगों में ग़ुस्सा पैदा कर दिया. तभी कांग्रेसी नेता रामचर ने सत्याग्रहियों को संबोधित करना शुरू कर दिया. मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि उन्हें वहां भाषण देने की अनुमति नहीं है इसलिए वह जगह को छोड़ दें लेकिन रामचर ने आदेश नहीं माना. इसके बाद पुलिस ने लोगों पर लाठीचार्ज शुरू कर दिया.
इसी दौरान ज़िले के पुलिस अधीक्षक ने अपनी पिस्तौल से गोलियां चलानी शुरू कर दीं जिसमें एक शख़्स की मौक़े पर ही मौत हो गई. इसके बाद पुलिस अधीक्षक समेत कई पुलिसकर्मियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं.
एक के बाद सत्याग्रही बग़ीचे में गिरते चले गए.
यह गोलीबारी दोपहर एक बजे शुरू हुई जिसके कारण 32 लोगों की मौत हुई और तकरीबन 48 लोग घायल हुए. विदुरश्वत्था का बग़ीचा सत्याग्रहियों के शवों से क़ब्रिस्तान में तब्दील हो गया. उनके शव पूरे बाग़ में फैले हुए थे.
लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि दक्षिण भारत भी जलियांवाला बाग जैसी एक त्रासदी झेल चुका है.
उस दिन आंध्र प्रदेश के अनंतपुर की सीमा से सटे एक बग़ीचे में स्वतंत्रता सेनानियों का एक समूह इकट्ठा हुआ था.
वहां जुटे लोगों पर पुलिस ने गोलियां बरसाई थीं और 32 लोग काल के गाल में समा गए.
यह त्रासदी 25 अप्रैल 1938 को विदुरश्वत्था में हुई थी. यह जगह आज कर्नाटक के गौरीबिदानुर ज़िले में पड़ता है.
विदुरश्वत्था तब मैसूर रजवाड़े के कोलार का एक गांव था. उस दिन यहां की धरती 32 स्वतंत्रता सेनानियों के ख़ून से रंग गई थी.
उनकी शहादत ने मैसूर राज्य में आज़ादी के आंदोलन को और मज़बूती प्रदान की. ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर उतर आए और उनका यह संकल्प आज़ादी मिलने तक कायम रहा.
आज विदुरश्वत्था, कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से 90 किलोमीटर और आंध्र प्रदेश के हिंदूपुर से महज़ 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.
ब्रिटिश राज के अधीन मैसूर राज के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विदुरश्वत्था ने गांधी के मार्ग को अपनाया था.
यह वो समय था जब आज़ादी को लेकर कांग्रेस का संघर्ष अपने चरम पर था.
तब मैसूर राज ने आदेश पारित किया कि उनके अधिकार क्षेत्र में कोई भी राष्ट्र ध्वज नहीं फ़हराएगा. यह भी कहा गया कि जो झंडा फ़हराने की हिमाकत करेगा गोली मार कर उसकी जान ले ली जाएगी.
मैसूर राज के इस आदेश का विरोध करते हुए भोगराजू पट्टाभि सीतारमैया, केटी श्याम, हारदेकर, सिद्धालिंगैया, केसी रेड्डी, रामाचार जैसे तब के कांग्रेसी नेताओं ने मंड्या ज़िले के शिवपुरा में आयोजित होने वाली कांग्रेस की बैठक के दौरान राष्ट्रीय ध्वज को फ़हराने का फ़ैसला किया.
उनके इस फ़ैसले की जानकारी सरकार तक पहुंच गई और वहां पुलिस तैनात कर दी गई. शोधकर्ता गंगाधर मूर्ति और स्मिता रेड्डी ने अपनी किताब 'जलियांवाला बाग़ ऑफ़ कर्नाटक' में विदुरश्वत्था नरसंहार के बाद की घटनाओं पर विस्तार से लिखा है.
उसमें लिखा गया है कि तीन दिवसीय उस बैठक के दौरान जब कांग्रेसियों ने झंडा फ़हराने की कोशिश की तो ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.
शिवपुरा में उनके झंडा फहराने की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया, तो कांग्रेसी नेताओं ने 18 अप्रैल 1938 को विदुरश्वत्था में राष्ट्रीय ध्वज फ़हराने के लिए 'ध्वज सत्याग्रह' सभा का आयोजन किया.
चूंकि यह जगह आंध्र प्रदेश के क़रीब है तो सीमावर्ती नेताओं के यहां आने की उम्मीद थी. नेताओं ने कोलार ज़िले में घूम-घूमकर इस सभा का प्रचार किया.
मैसूर सरकार को उनकी इन गतिविधियों के बारे में सब पता था. उसने इस विदुरश्वत्था इलाक़े के दो किलोमीटर के दायरे में निषेधाज्ञा लगाकर किसी भी कार्यक्रम को आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया.
कांग्रेसी नेताओं ने रणनीतिक रूप से पहले चार दिनों में कोई भी गतिविधि नहीं की.
एन.सी. नागी रेड्डी के नेतृत्व में हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लिए नेताओं ने विदुरश्वत्था की ओर कूच किया.
रास्ते में उन्होंने लोगों को पर्चे बांटे और सरकार के आदेश को तोड़ते हुए उन्हें ध्वज सत्याग्रह में जुड़ने की अपील की. लोग उनके साथ जुड़े भी. वहीं, दूसरी ओर कल्लूरू सुब्बाराव के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश के लोग भी मार्च कर रहे थे.
हज़ारों लोगों ने विदुरश्वत्था की ओर कूच किया था जिसको पुलिस ने तितर-बितर भी किया. आख़िरकार कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के सत्याग्रही विदुरश्वत्था पहुंच गए और एक मंदिर के पीछे वाले बगीचे में इकट्ठा हुए.
नेताओं को जेल में डाला गया
पुलिस ने वहां पहुंचकर एन.सी. नागी रेड्डी और दूसरे नेताओं को गिरफ़्तार कर उन्हें चिकबल्लापुर कोर्ट में पेश किया. जज ने सरकार के नियम को तोड़ने के लिए नेताओं से माफ़ी मांगने के लिए कहा लेकिन उन्होंने माफ़ी नहीं मांगी जिसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया.
कोलार ज़िले में जब नेताओं के जेल में डाले जाने का लोगों को पता चला तो वह सड़कों पर उतर आओ और उन्होंने सरकार विरोधी प्रदर्शन किए.
इसके बाद विदुरश्वत्था में स्थिति तनावग्रस्त हो गई. बगीचे में इकट्ठा सभी सत्याग्रही ग़ुस्से से भरे हुए थे.
लोगों को नियंत्रण करना मुश्किल हो गया था जिसके बाद अतिरिक्त सुरक्षाबलों को वहां भेजा गया. वहां चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई. हालांकि वहां लोगों की संख्या लगातार बढ़ती रही.
पुलिस ने सत्याग्रहियों को बग़ीचे के एक कोने तक सीमित कर दिया और सभी आने-जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया.
नरसंहार का दिन
25 अप्रैल 1938 को गौरीबिदानुर और आसपास के गांवों से सुबह साढ़े दस बजे के क़रीब लोग पहुंचने लगे.
वहीं, तकरीबन 25 हज़ार लोग झंडा फ़हराने का इंतज़ार कर रहे थे. सत्याग्रहियों ने तय किया कि तय समय से पहले ही झंडा फ़हराया जाए लेकिन जैसे ही वे झंडा फ़हराने के लिए तैयार हुए पुलिस ने अपनी बंदूक़ें उनकी ओर मोड़ दीं.
लेकिन तब भी जब सत्याग्रही पीछे नहीं हटे तो पुलिस ने वेदुलवेनी सुरन्ना, नारायण स्वामी, कल्लूरू सुब्बाराव जैसे नेताओं को गिरफ़्तार कर वहां से हटा दिया.
उन नेताओं की गिरफ़्तारी ने लोगों में ग़ुस्सा पैदा कर दिया. तभी कांग्रेसी नेता रामचर ने सत्याग्रहियों को संबोधित करना शुरू कर दिया. मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि उन्हें वहां भाषण देने की अनुमति नहीं है इसलिए वह जगह को छोड़ दें लेकिन रामचर ने आदेश नहीं माना. इसके बाद पुलिस ने लोगों पर लाठीचार्ज शुरू कर दिया.
इसी दौरान ज़िले के पुलिस अधीक्षक ने अपनी पिस्तौल से गोलियां चलानी शुरू कर दीं जिसमें एक शख़्स की मौक़े पर ही मौत हो गई. इसके बाद पुलिस अधीक्षक समेत कई पुलिसकर्मियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं.
एक के बाद सत्याग्रही बग़ीचे में गिरते चले गए.
यह गोलीबारी दोपहर एक बजे शुरू हुई जिसके कारण 32 लोगों की मौत हुई और तकरीबन 48 लोग घायल हुए. विदुरश्वत्था का बग़ीचा सत्याग्रहियों के शवों से क़ब्रिस्तान में तब्दील हो गया. उनके शव पूरे बाग़ में फैले हुए थे.
Monday, April 8, 2019
आईपीएल-12 अभी तक टॉप पर क्यों है कोलकाता?
आईपीएल-12 को शुरू हुए आज दो सप्ताह हो चुके हैं. दो सप्ताह के बाद कोलकाता नाइट राइडर्स अंक तालिका में पहले स्थान पर है.
रविवार को खेले गए दूसरे मुक़ाबले में उसने राजस्थान रॉयल्स को आठ विकेट से ऐसे हराया जैसे वह उसके बांए हाथ का खेल था.
आख़िरकार उसने जीत के लिए केवल 140 रनों का लक्ष्य 13.5 ओवर में ही महज़ दो विकेट खोकर हासिल कर लिया.
जिस पिच पर टॉस हारकर पहले बल्लेबाज़ी की दावत पाकर राजस्थान के बल्लेबाज़ों को सांप सूंघ गया और वह निर्धारित 20 ओवर खेलकर तीन विकेट खोकर 139 रन ही बना सकी उसी पिच पर कोलकाता ने दिखाया कि बल्लेबाज़ी कैसे की
जाती है.
जीत के लिए 140 रनों की तलाश में कोलकाता ने क्रिस लिन और सुनील नारायण के साथ ज़ोरदार शुरूआत की .
इन दोनों ने पहले विकेट के लिए 91 रन जोड़कर राजस्थान रॉयल्स के गेंदबाज़ों के लिए मुश्किल पैदा कर दी.
क्रिस लिन ने केवल 32 गेंदों पर छह चौके और तीन छक्कों की मदद से 50 और सुनील नारायण ने भी 25 गेंदों पर छह चौके और तीन छक्कों के सहारे 47 रन ठोक ड़ाले.
उसके पास सुनील नारायण जैसा अनोखा सलामी बल्लेबाज़ है जो अपनी रहस्यमयी गेंदबाज़ी के लिए जाना जाता है लेकिन जब उनका बल्ला बोलता है तो अच्छे-अच्छे गेंदबाज़ भी पानी भरने लगते है.
इसके अलावा रविवार को 50 रन बनाने के अलावा क्रिस लिन ने पिछले मैच में भी बैंग्लोर के ख़िलाफ़ 31 गेंदों पर महत्वपूर्ण 43 रन बनाए.
कोलकाता के रोबिन उथप्पा भी इस बार छुपे रूस्तम ही साबित हुए हैं.
उन्होंने हैदराबाद के ख़िलाफ़ 35, पंजाब के ख़िलाफ़ नाबाद 67, बैंग्लोर के ख़िलाफ़ 33 और रविवार को राजस्थान के ख़िलाफ़ नाबाद 26 रन बनाए.
मज़बूत कंधों के मालिक रसेल ने पिछले मैच में विराट कोहली की कप्तानी में खेल रही बैंग्लोर के ख़िलाफ़ केवल 13 गेंदों पर एक चौके और सात छक्कों की मदद से नाबाद 48 रनों की ऐसी पारी खेली जिसे इस सीज़न की सबसे आकर्षक और
बेहद रोमांचकारी पारी माना जा सकता है.
रसेल का बल्ला ऐसा बोला कि उसने जीत की राह की तरफ बढ़ रही बैंग्लोर को हार के मुंह में घकेल दिया.
बेहद मुश्किल हालात से मैच निकाल लेने की रसेल की क्षमता इससे पहले भी इस आईपीएल में दिखी है.
उन्होंने दिल्ली के ख़िलाफ़ 62, पंजाब के ख़िलाफ़ 48 और हैदराबाद के ख़िलाफ़ नाबाद 48 रन बनाकर अपना अहम योगदान दिया.
उन्हें लेकर वेस्ट इंडीज़ के पूर्व कप्तान ब्रायन लारा ने भी कहा है कि अगर रसेल के साथ 10 खिलाड़ी और जोड़ दिये जाए तो वेस्ट इंडीज़ की विश्व कप की टीम तैय्यार है.
और नीतीश राणा का भी क्या कहना. उन्होंने बैंग्लोर के ख़िलाफ़ 37, पंजाब के ख़िलाफ़ 63 और हैदराबाद के ख़िलाफ़ 68 रन बनाए.
अब अगर जिस टीम के पास सलामी जोड़ी से लेकर नम्बर पांच-छह तक बेहद आक्रामक और समझदारी के अलावा किसी भी परिस्थिति में मैच को जीता देने वाली क्षमता वाले बल्लेबाज़ हो तो फिर कप्तान दिनेश कार्तिक क्यों चिंता करे.
गेंदबाज़ी में कोलकाता के पास भले ही हैरतअंगेज़ गेंदबाज़ नहीं हैं लेकिन फिर भी कुलदीप यादव और अनुभवी पियूष चावला हैं.
यह ऐसे स्पिनर हैं जो किसी भी बल्लेबाज़ को बांध कर रख सकते हैं.
अभी तो ख़ैर अपने बल्लेबाज़ों के दम पर कोलकाता दो सप्ताह में अपना दमख़म दिखाने में कामयाब रही है.
ज़ाहिर है इन दिनों कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख ख़ान भी खुश ही होंगे.
वैसे भी कोलकाता आईपीएल में दो बार, यानी साल 2012 और 2014 में चैंपियन रह चुकी है.
रविवार को खेले गए दूसरे मुक़ाबले में उसने राजस्थान रॉयल्स को आठ विकेट से ऐसे हराया जैसे वह उसके बांए हाथ का खेल था.
आख़िरकार उसने जीत के लिए केवल 140 रनों का लक्ष्य 13.5 ओवर में ही महज़ दो विकेट खोकर हासिल कर लिया.
जिस पिच पर टॉस हारकर पहले बल्लेबाज़ी की दावत पाकर राजस्थान के बल्लेबाज़ों को सांप सूंघ गया और वह निर्धारित 20 ओवर खेलकर तीन विकेट खोकर 139 रन ही बना सकी उसी पिच पर कोलकाता ने दिखाया कि बल्लेबाज़ी कैसे की
जाती है.
जीत के लिए 140 रनों की तलाश में कोलकाता ने क्रिस लिन और सुनील नारायण के साथ ज़ोरदार शुरूआत की .
इन दोनों ने पहले विकेट के लिए 91 रन जोड़कर राजस्थान रॉयल्स के गेंदबाज़ों के लिए मुश्किल पैदा कर दी.
क्रिस लिन ने केवल 32 गेंदों पर छह चौके और तीन छक्कों की मदद से 50 और सुनील नारायण ने भी 25 गेंदों पर छह चौके और तीन छक्कों के सहारे 47 रन ठोक ड़ाले.
उसके पास सुनील नारायण जैसा अनोखा सलामी बल्लेबाज़ है जो अपनी रहस्यमयी गेंदबाज़ी के लिए जाना जाता है लेकिन जब उनका बल्ला बोलता है तो अच्छे-अच्छे गेंदबाज़ भी पानी भरने लगते है.
इसके अलावा रविवार को 50 रन बनाने के अलावा क्रिस लिन ने पिछले मैच में भी बैंग्लोर के ख़िलाफ़ 31 गेंदों पर महत्वपूर्ण 43 रन बनाए.
कोलकाता के रोबिन उथप्पा भी इस बार छुपे रूस्तम ही साबित हुए हैं.
उन्होंने हैदराबाद के ख़िलाफ़ 35, पंजाब के ख़िलाफ़ नाबाद 67, बैंग्लोर के ख़िलाफ़ 33 और रविवार को राजस्थान के ख़िलाफ़ नाबाद 26 रन बनाए.
मज़बूत कंधों के मालिक रसेल ने पिछले मैच में विराट कोहली की कप्तानी में खेल रही बैंग्लोर के ख़िलाफ़ केवल 13 गेंदों पर एक चौके और सात छक्कों की मदद से नाबाद 48 रनों की ऐसी पारी खेली जिसे इस सीज़न की सबसे आकर्षक और
बेहद रोमांचकारी पारी माना जा सकता है.
रसेल का बल्ला ऐसा बोला कि उसने जीत की राह की तरफ बढ़ रही बैंग्लोर को हार के मुंह में घकेल दिया.
बेहद मुश्किल हालात से मैच निकाल लेने की रसेल की क्षमता इससे पहले भी इस आईपीएल में दिखी है.
उन्होंने दिल्ली के ख़िलाफ़ 62, पंजाब के ख़िलाफ़ 48 और हैदराबाद के ख़िलाफ़ नाबाद 48 रन बनाकर अपना अहम योगदान दिया.
उन्हें लेकर वेस्ट इंडीज़ के पूर्व कप्तान ब्रायन लारा ने भी कहा है कि अगर रसेल के साथ 10 खिलाड़ी और जोड़ दिये जाए तो वेस्ट इंडीज़ की विश्व कप की टीम तैय्यार है.
और नीतीश राणा का भी क्या कहना. उन्होंने बैंग्लोर के ख़िलाफ़ 37, पंजाब के ख़िलाफ़ 63 और हैदराबाद के ख़िलाफ़ 68 रन बनाए.
अब अगर जिस टीम के पास सलामी जोड़ी से लेकर नम्बर पांच-छह तक बेहद आक्रामक और समझदारी के अलावा किसी भी परिस्थिति में मैच को जीता देने वाली क्षमता वाले बल्लेबाज़ हो तो फिर कप्तान दिनेश कार्तिक क्यों चिंता करे.
गेंदबाज़ी में कोलकाता के पास भले ही हैरतअंगेज़ गेंदबाज़ नहीं हैं लेकिन फिर भी कुलदीप यादव और अनुभवी पियूष चावला हैं.
यह ऐसे स्पिनर हैं जो किसी भी बल्लेबाज़ को बांध कर रख सकते हैं.
अभी तो ख़ैर अपने बल्लेबाज़ों के दम पर कोलकाता दो सप्ताह में अपना दमख़म दिखाने में कामयाब रही है.
ज़ाहिर है इन दिनों कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख ख़ान भी खुश ही होंगे.
वैसे भी कोलकाता आईपीएल में दो बार, यानी साल 2012 और 2014 में चैंपियन रह चुकी है.
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