Wednesday, January 23, 2019

प्रियंका गांधी की एंट्री और राहुल गांधी की बातों के मायने

राहुल गांधी अमेठी के लिए जब बुधवार को लखनऊ हवाई अड्डे पर उतरे तो उनकी आगवानी करने वाले युवा कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने उनसे जो बात कह रहे थे उसमें बार-बार ये बात गूंज रही थी- भैया जी आपको यूपी में ज़्यादा समय देना होगा.

जब ये बात थोड़ी ज़्यादा होने लगी तो राहुल गांधी ने कहा, "आज दोपहर तक ऐसी गोली देता हूं कि सारे रोग दूर हो जाएंगे और आपके अंदर नई एनर्जी आ जाएगी."

उस वक़्त तक लखनऊ से लेकर दिल्ली तक किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि राहुल गांधी ना केवल प्रियंका गांधी को महासचिव बना चुके हैं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपने का फ़ैसला लेकर अमेठी पहुंच रहे हैं.

वैसे, प्रियंका गांधी की राजनीति में आने की सुगबुगहाट, कोई नई बात नहीं है, चाहे वह अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रचार करना रहा हो या फिर राहुल गांधी के पीछे साये की तरह रहना, प्रियंका गांधी इन भूमिकाओं में लगातार नज़र आती रहीं थीं. लेकिन इससे ज़्यादा की भूमिका के लिए वे अनिच्छा जताती रहीं थीं.

लेकिन पिछले साल 13 जुलाई को जब उन्होंने कांग्रेस के सभी विभागों को देख रहे लोगों के साथ वन-टू-वन बैठक लेने के बाद सबसे अगले सौ दिन का एजेंडा पूछा तो ये क़यास लगने लगे थे कि प्रियंका गांधी अब बड़ी भूमिका के लिए तैयार हो चुकी हैं.

कांग्रेस पार्टी को एक उपयुक्त मौक़े का इंतज़ार था, जो तीन राज्यों में सरकार बनाने के बाद आ चुका था, लेकिन वो मौक़ा किस रूप में सामने आना था.

इसको लेकर कोई भी क़यास लगाने से हिचक रहा था तो इसकी वजह यही थी कि ये फ़ैसला पार्टी के नेतृत्व संभालने वाले परिवार के अंदर का था.

बहरहाल जब ये फ़ैसला सामने आया तब से उत्तर प्रदेश में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की स्थिति के बारे में वाराणसी से कांग्रेस नेता अजय राय बताते हैं, "कल से लगातार फ़ोन की घंटियां बज रही हैं, युवा और महिला कार्यकर्ता तो ख़ुशी से पागल हो रहे हैं लेकिन मेरे पास ऐसे कार्यकर्ताओं के फ़ोन आ रहे हैं जो कमलापति त्रिपाठी के वक़्त तो कांग्रेसी थे और बाद में दूसरी जगहों पर चले गए."

अजय राय ने तो प्रियंका गांधी से वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ने की अपील भी कर दी है.

उनका दावा है कि प्रियंका गांधी वाराणसी से लड़ीं तो नरेंद्र मोदी को हराने का करिश्मा भी कर दिखाएंगी. हालांकि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सामने कांग्रेस इतना बड़ा जोख़िम लेगी, इसमें संदेह है.

कमोबेश यूपी के हर इलाक़े से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में ऐसा उत्साह दिख रहा है लेकिन प्रियंका की एंट्री, राहुल गांधी के लिए राजनीतिक तौर पर कितना मायने रख रही है, इसे उनकी कही बातों में समझा जा सकता है.

पहली बात यही है कि हम बीजेपी को रोकेंगे, महागठबंधन से हमारा बैर नहीं है. ज़ाहिर है राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी-अमित शाह की वापसी को रोकने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगा रहे हैं. साथ ही उन्होंने ये भी संकेत दे दिया है कि वे ज़रूरत पड़ने पर महागठबंधन से हाथ भी मिला सकते हैं.

लेकिन इस बयान का राजनीतिक मायने भी है, राहुल गांधी ने इससे साफ़ किया है कि बीजेपी को रोकने के लिए वे किसी भी महागठबंधन का हिस्सा बनने को तैयार हैं. और वे गठबंधन से दूर नहीं भाग रहे हैं बल्कि यूपी में महागठबंधन कांग्रेस से दूर भाग रही है. यह स्थिति अपने समर्थकों के अलावा दूसरे राजनीतिक दलों में राहुल गांधी की स्वीकार्यता को और बढ़ाएगी.

लेकिन इसके बाद राहुल गांधी का दूसरा बयान ज़्यादा अहम है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब बैकफुट पर नहीं फ्रंट फुट पर खेलेगी. साफ़ है कि वे नरेंद्र मोदी को आमने-सामने की चुनौती देते नज़र आ रहे हैं. लेकिन इसके राजनीतिक निहतार्थ महागठबंधन के नेताओं के लिए भी है, अगर ज़रूरत पड़ी तो राहुल गांधी अकेले दम पर कांग्रेस को यूपी में खड़ा करने की चुनौती उठाने को तैयार हैं.

हालांकि वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अंबिकानंद सहाय इसको दूसरी तरह से देखते हैं. वे कहते हैं, 2019 की जहां तक बात है तो राहुल गांधी की कोशिश महागठबंधन को चुनौती देने की नहीं होगी क्योंकि उनके सामने नरेंद्र मोदी को हराने की चुनौती है.

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय में जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी प्रियंका गांधी को बनाया गया है वह इलाक़ा अब तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का इलाक़ा माना जाता रहा है, जिसे 2014 में अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग ने तार-तार कर दिया था.

हालांकि दिलचस्प ये है कि ये इलाक़ा कांग्रेस के लिए भी उतना ही मज़बूत रहा है. 2009 में यूपी में जब कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं, तब 13 सीटें इसी पूर्वांचल से उसके खाते में आई थीं.

दरअसल, दलितों और मुसलमानों की मौजूदगी के साथ-साथ ब्राह्मणों की बड़ी आबादी इस हिस्से में प्रभावी भूमिका निभाती रही है. प्रियंका के सहारे इस इलाक़े में कांग्रेस अपनी खोई हुई ज़मीन को हासिल करने की कोशिश करेगी.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी कहते हैं, "देखिए हमारा मतदाता ही बीजेपी और महागठबंधन के दलों की ओर चला गया था. जब वो हमारी ओर लौटेगा तो नुक़सान तो दोनों का होगा. लेकिन ज़्यादा नुक़सान बीजेपी का होगा क्योंकि एक तो उनकी सीटें ज़्यादा हैं और दूसरी बात ये है कि उनका पूरा वोटबैंक ही परंपरागत तौर पर कांग्रेस का वोट बैंक रहा है."

प्रियंका गांधी की सक्रियता का असर शहरी और सवर्ण मतदाताओं पर पड़ सकता है. सोशल साइंसेंज एंड डेवलपमेंट स्टडीज (सीएसडीएस) के अनुमान आधारित आंकड़ों के मुताबिक़ 2014 के आम चुनाव में बीजेपी को शहरी क्षेत्र में 55 फ़ीसदी मत मिले थे, कांग्रेस को 20 फ़ीसदी, जबकि बहुजन समाज को 14 और समाजवादी पार्टी को महज़ सात फ़ीसदी.

Wednesday, January 16, 2019

बियर बोतलों पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर का क्या है सच?

सोशल मीडिया पर ऑस्ट्रेलियाई 'बियर के इश्तेहार' की एक कॉपी शेयर की जा रही है जिसपर हिंदुओं के देवता गणेश की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया है.

दक्षिण भारत के कई व्हॉट्सऐप ग्रुप्स में इस वायरल विज्ञापन को ये कहते हुए शेयर किया गया है कि इस तरह से मदिरा की बोतल पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों का इस्तेमाल कर हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाई जा रही है.

कुछ ट्विटर यूज़र्स ने इस तस्वीर को ट्वीट करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत कई अन्य बड़े नेताओं से अपील की है कि वो इसके ख़िलाफ़ शिकायत करें और बोतल के लेबल पर लगी गणेश की तस्वीर को हटवाने का प्रयास करें.

बहुत से लोगों ने इस विज्ञापन के साथ ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल को भी टैग किया है और उनसे विज्ञापन जारी करने वाली कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की अपील की है.

वायरल विज्ञापन के अनुसार ऑस्ट्रेलिया की ब्रुकवेल यूनियन नाम की बियर कंपनी जल्द कोई नया ड्रिंक ला रही है जिसपर भगवान गणेश की तस्वीर है और हॉलीवुड फ़िल्म 'पायरेट्स ऑफ़ कैरेबियन' की तर्ज़ पर उनका हुलिया बदल दिया गया है.

सोशल मीडिया पर कई लोग ऐसे भी हैं जो इस विज्ञापन को सही मानने को तैयार नहीं है. उनकी राय है कि किसी ने इस विज्ञापन के साथ छेड़छाड़ की है.

लेकिन अपनी पड़ताल में हमने इस विज्ञापन को सही पाया. ब्रुकवेल यूनियन नाम की ऑस्ट्रेलियाई बियर कंपनी जल्द एक ड्रिंक लेकर आ रही है जिसकी बोतल पर गणेश की तस्वीर का इस्तेमाल किया जाएगा.

पुराना विवाद

ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स (सिडनी) में स्थित ये कंपनी साल 2013 में भी बियर की बोतलों पर गणेश और लक्ष्मी की तस्वीर इस्तेमाल करने को लेकर विवादों में रह चुकी है.

उस समय कंपनी ने बोतल पर देवी लक्ष्मी की तस्वीर लगाई थी और उनके सिर को गणेश के सिर से बदल दिया था. बोतल पर गाय और 'माता के शेर' को भी छापा गया था.

द टेलीग्राफ़' कीरिपोर्ट के अनुसार साल 2013 में इस विवादित विज्ञापन पर एक तथाकथित अंतरराष्ट्रीय हिंदू संगठन ने आपत्ति दर्ज कराई थी और कहा था कि पैसे कमाने के लिए हिंदुओं की धार्मिक भावना का मज़ाक उड़ाना गिरी हुई हरक़त है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.

इस रिपोर्ट के अनुसार हिंदू संगठन ने ब्रुकवेल यूनियन के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने की भी बात कही थी.

समाचार एजेंसी 'पीटीआई' के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लोगों ने कंपनी द्वारा देवी लक्ष्मी का फ़ोटो इस्तेमाल किये जाने की मुख़ालफ़त की थी और विवाद बढ़ता देख बियर कंपनी ने एक बयान जारी कर भारतीय समुदाय के लोगों से माफ़ी मांगी थी.

डेली टेलीग्राफ़' ने अपनी रिपोर्ट में कंपनी का बयान छापा था जिसमें लिखा था, "हम लड़ने वाले नहीं, प्यार करने वाले लोग हैं. हमें लगता है कि ना चाहते हुए भी हमने अपने हिंदू साथियों की धार्मिक आस्था को ठेस पहुँचाई है. हम फ़ीडबैक ले रहे हैं. कुछ नए डिज़ाइन भी ढूंढ रहे हैं. हमारी कोशिश होगी कि हम जल्द से जल्द बोतलों की नई ब्रांडिंग और नया डिज़ाइन तैयार करवाएं."

Monday, January 14, 2019

चाइनीज मांझे से कटा मासूम का गला, मकर संक्रांत‍ि पर पसरा घर में मातम

14 जनवरी को पूरे देश में धूमधाम से मकर संक्रांति मनाई जा रही है, लेक‍िन आज का ये मौका एक घर में मातम का द‍िन बन गया. राजस्थान के जयपुर में 6 साल के बच्चे के गले में अचानक मांझा उलझा और कट लग गया. बेहोश होकर पत्थर पर ग‍िरने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गयालेक‍िन उसे बचाया न जा सका.

रव‍िवार शाम को विद्याधर नगर के सेक्टर 1 के पार्क में खेल रहे पार्थ उर्फ खुश अग्रवाल के गले में अचानक मांझा आकर उलझा और कट लग गया. वह बेहोश होकर पत्थर पर गिर पड़ा. उसे इलाज के ल‍िए अस्पताल ले जाया गया. इलाज के दौरान अस्पताल में पार्थ की मौत हो गई.

दो भाइयों को क‍िया ग‍िरफ्तार

पुल‍िस ने कार्रवाई करते हुए जयपुर के पुराना विद्याधर नगर में चाइनीज मांझे से पतंग उड़ा रहे दो भाइयों- मुबारक व आसिफ अली को गिरफ्तार क‍िया. इनसे चाइनीज मांझे की 3 चरखियां म‍िलीं. राजस्थान में चाइनीज मांझे के उपयोग के खिलाफ यह पहली कार्रवाई बताई जा रही है.

नाकाफी साब‍ित हो रहे हैं प्रयास

चाइनीज मांझे की वजह से हो रही जनहानि और अन्य दुर्घटनाओं के मद्देनजर धरपकड़ के लिए अधिकारियों को कार्रवाई करने के न‍िर्देश हैं, लेकिन यह नाकाफी साब‍ित हो रहे हैं. जगह-जगह दुकानदारों को चाइनीज मांझा नहीं बेचने के लिए पाबंद किया गया है, लेक‍िन फ‍िर भी धड़ल्लेसे इसकी ब‍िक्री चल रही है. यही कारण है क‍ि मांझा न स‍िर्फ दुकानदार बेच रहे हैं बल्क‍ि लोग इसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं.

गौरतलब है क‍ि एनजीटी ने एक मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली सहित पूरे देश में मांझे (कांच के टुकड़े लगे हुए पतंग उड़ाने के विशेष धागे) के इस्तेमाल और बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबन्ध लगा दिया था. इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा था कि यह बहुत जानलेवा साबितहो रहा है. दावा क‍िया गया था क‍ि सिर्फ पिछले दो सालों में ही कम से कम 50 लोगों की मौत मांझे से गला कट जाने से हो चुकी है.

तेल बेचने वाली कंपनियों ने सोमवार को दिल्ली और मुंबई में पेट्रोल के दाम में 38 पैसे, जबकि कोलकाता में 37 पैसे और चेन्नई में 40 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि की. डीजल के दाम में दिल्ली और कोलकाता में 49 पैसे, जबकि मुंबई में 52 पैसे और चेन्नई में 53 पैसे लीटर का इजाफा हुआ है.

इंडियन ऑयल की वेबसाइट के मुताबिक, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में पेट्रोल के दाम बढ़कर क्रमश: 70.13 रुपए, 72.24 रुपए, 75.77 रुपए और 72.79 रुपए प्रति लीटर हो गए हैं. चारों महानगरों में डीजल के दाम बढ़कर क्रमश: 64.18 रुपए, 65.95 रुपए, 67.18 रुपए और 67.78 रुपए प्रति लीटर हो गए हैं.

न्यूज एजेंसी आईएएनएस ने बताया कि दिल्ली-एनसीआर स्थित नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम में पेट्रोल की कीमतें बढ़कर क्रमश: 70.07 रुपए, 69.94 रुपए, 71.31 रुपए और 71.10 रुपए प्रति लीटर हो गई हैं. इन चारों शहरों में डीजल के दाम तीसरे दिन की वृद्धि के बाद क्रमश: 63.59 रुपए, 63.46 रुपए, 64.41 रुपए और 64.20 रुपए प्रति लीटर हो गए हैं. देश कुछ अन्य प्रमुख शहर, चंडीगढ़, लखनऊ, पटना, रांची, भोपाल और जयपुर में पेट्रोल की कीमतें नई बढ़कर क्रमश: 66.32 रुपए, 69.94 रुपए, 74.24 रुपए, 69.02 रुपए, 73.18 रुपए और 70.77 रुपए प्रति लीटर हो गई हैं.

Monday, January 7, 2019

सवर्ण आरक्षण के ज़रिए मोदी की विपक्ष को नई चुनौती: नज़रिया

सवर्ण जातियों के लिए शिक्षा और नौकरियों में दस फ़ीसदी आरक्षण देने का नरेन्द्र मोदी सरकार का फ़ैसला एक तीर से कई निशाने साधता है.

लोकसभा चुनाव के नज़रिए से सरकार का यह क़दम गेम चेंजर साबित हो सकता है, पर इसके साथ कई किंतु-परंतु जुड़े हुए हैं.

सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक साउथ ब्लॉक की बजाय संसद परिसर में हुई. बैठक आधे घंटे से ज़्यादा नहीं चली.

इसमें सवर्ण जातियों को दस फ़ीसदी आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक के मसौदे को मंज़ूरी दी गई. मोदी ने अपनी कार्यशैली के मुताबिक़ इसको गोपनीय रखा.

हालांकि अभी तक इसकी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, क्योंकि संसद का सत्र चल रहा है और इस दौरान सरकार संसद से बाहर कोई नीतिगत घोषणा नहीं कर सकती.

प्रधानमंत्री ने अपने इस क़दम से अपने राजनीतिक विरोधियों को सकते में डाल दिया है. उनके लिए सरकार के इस क़दम का समर्थन और विरोध करना दोनों कठिन हो जाएगा.

कई ऐसे क्षेत्रीय दल हैं जिसमें बहुजन समाज पार्टी भी शामिल है, जो पिछले कई सालों से ग़रीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग करती रही हैं.

इन सबके लिए चुनाव के समय इस संविधान संशोधन विधेयक का विरोध करना संभव नहीं होगा, इसीलिए कांग्रेस ने इसका समर्थन करते हुए रोज़गार का सवाल उठाया है. कई पार्टियां अभी तय नहीं कर पा रही हैं कि क्या बोलें.

गुजरात चुनाव के बाद पहली बार प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय विमर्श को निर्णायक तरीक़े से बदल दिया है. पिछले एक साल से भाजपा इसमें पिछड़ रही थी.

ऐसे समय जब सारे देश में राम जन्म भूमि की चर्चा हो रही है मोदी ने नया दांव चल दिया है. अब सवर्ण आरक्षण का यह मुद्दा चुनाव तक राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रह सकता है.

मंदिर मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में खड़ी भाजपा अब इस मुद्दे पर आक्रामक नज़र आएगी.

राम मंदिर के मुद्दे पर जो लोग सक्रिय थे उनमें सवर्णों की संख्या ही ज़्यादा थी. सरकार के इस क़दम से अनुसूचित जाति/ जनजाति के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बदलने से सवर्णों में उपजी नाराज़गी काफ़ी हद तक कम होगी.

मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी थी. भाजपा सरकार से नाराज़गी के ये दो मुद्दे ख़त्म तो नहीं होंगे पर उनकी धार ज़रूर कुंद हो जाएगी.

सवाल है कि यह काम मोदी सरकार पांच राज्यों के चुनाव से पहले भी कर सकती थी. लेकिन उसने नहीं किया, क्यों? भाजपा नहीं चाहती थी कि इतने बड़े ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल छोटे लक्ष्य के लिए किया जाए. पूरी पार्टी की रणनीति के केंद्र में इस समय सिर्फ़ लोकसभा चुनाव हैं.

सवर्ण जातियों को आरक्षण देने के फ़ैसले से देश के अलग-अलग राज्यों में चले तीन जातीय आंदोलनों का भी फ़ौरी तौर पर तो शमन हो जाएगा.

गुजरात में पाटीदार आंदोलन, महाराष्ट्र में मराठा और हरियाणा में जाट आंदोलन ने सरकार के लिए बहुत मुश्किल खड़ी कर दी थी.

इत्तफ़ाक़ से तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है, इसलिए बात सीधे मोदी तक पहुंचती थी. ये तीनों जातियां पिछड़े वर्ग के कोटे में आरक्षण की मांग कर रही थीं.

उनकी मांग का समर्थन करना पिछड़ों की नाराज़गी का सबब बन सकता था. आरक्षण की सीमा 49.5 फ़ीसदी से बढ़ाकर 59.5 फीसदी करने से किसी से कुछ छीना नहीं जा रहा, इसलिए दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों में अगड़ों को मिलने वाले आरक्षण से कोई नाराज़गी नहीं होगी.

साथ ही सवर्णों में आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़े की शिकायत भी दूर होगी. उसे लगता था कि केवल जाति के कारण उसकी ग़रीबी को ग़रीबी नहीं माना जाता.

मोदी सरकार के इस क़दम से अगड़ी जातियों में पूरी आरक्षण व्यवस्था को लेकर पनप रहे अंसतोष पर थोड़ा पानी पड़ेगा.

इसलिए जातीय वैमनस्य की जो कटुता समाज में दिख रही थी वह थोड़ी तो कम होगी ही.

भाजपा के अंदर भी सवर्णों के एक वर्ग को इस बात का गिला था कि प्रधानमंत्री हर समय पिछड़ों और दलितों की बात करते हैं. सवर्णों के वोट भाजपा को मिलते हैं पर पार्टी और सरकार उनके बारे में कुछ सोचती नहीं.

यह एक नये तरह की सोशल इंजीनीयरिंग है. जिसमें एक वर्ग को कुछ मिलने से दूसरा वर्ग नाराज़ नहीं हो रहा है.

अब संसद में इस मुद्दे पर जिस तरह की राजनीतिक गोलबंदी बनेगी वह काफ़ी हद तक लोकसभा चुनाव का राजनीतिक समीकरण भी तय करेगी.