Monday, January 7, 2019

सवर्ण आरक्षण के ज़रिए मोदी की विपक्ष को नई चुनौती: नज़रिया

सवर्ण जातियों के लिए शिक्षा और नौकरियों में दस फ़ीसदी आरक्षण देने का नरेन्द्र मोदी सरकार का फ़ैसला एक तीर से कई निशाने साधता है.

लोकसभा चुनाव के नज़रिए से सरकार का यह क़दम गेम चेंजर साबित हो सकता है, पर इसके साथ कई किंतु-परंतु जुड़े हुए हैं.

सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक साउथ ब्लॉक की बजाय संसद परिसर में हुई. बैठक आधे घंटे से ज़्यादा नहीं चली.

इसमें सवर्ण जातियों को दस फ़ीसदी आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक के मसौदे को मंज़ूरी दी गई. मोदी ने अपनी कार्यशैली के मुताबिक़ इसको गोपनीय रखा.

हालांकि अभी तक इसकी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, क्योंकि संसद का सत्र चल रहा है और इस दौरान सरकार संसद से बाहर कोई नीतिगत घोषणा नहीं कर सकती.

प्रधानमंत्री ने अपने इस क़दम से अपने राजनीतिक विरोधियों को सकते में डाल दिया है. उनके लिए सरकार के इस क़दम का समर्थन और विरोध करना दोनों कठिन हो जाएगा.

कई ऐसे क्षेत्रीय दल हैं जिसमें बहुजन समाज पार्टी भी शामिल है, जो पिछले कई सालों से ग़रीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग करती रही हैं.

इन सबके लिए चुनाव के समय इस संविधान संशोधन विधेयक का विरोध करना संभव नहीं होगा, इसीलिए कांग्रेस ने इसका समर्थन करते हुए रोज़गार का सवाल उठाया है. कई पार्टियां अभी तय नहीं कर पा रही हैं कि क्या बोलें.

गुजरात चुनाव के बाद पहली बार प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय विमर्श को निर्णायक तरीक़े से बदल दिया है. पिछले एक साल से भाजपा इसमें पिछड़ रही थी.

ऐसे समय जब सारे देश में राम जन्म भूमि की चर्चा हो रही है मोदी ने नया दांव चल दिया है. अब सवर्ण आरक्षण का यह मुद्दा चुनाव तक राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रह सकता है.

मंदिर मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में खड़ी भाजपा अब इस मुद्दे पर आक्रामक नज़र आएगी.

राम मंदिर के मुद्दे पर जो लोग सक्रिय थे उनमें सवर्णों की संख्या ही ज़्यादा थी. सरकार के इस क़दम से अनुसूचित जाति/ जनजाति के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बदलने से सवर्णों में उपजी नाराज़गी काफ़ी हद तक कम होगी.

मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी थी. भाजपा सरकार से नाराज़गी के ये दो मुद्दे ख़त्म तो नहीं होंगे पर उनकी धार ज़रूर कुंद हो जाएगी.

सवाल है कि यह काम मोदी सरकार पांच राज्यों के चुनाव से पहले भी कर सकती थी. लेकिन उसने नहीं किया, क्यों? भाजपा नहीं चाहती थी कि इतने बड़े ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल छोटे लक्ष्य के लिए किया जाए. पूरी पार्टी की रणनीति के केंद्र में इस समय सिर्फ़ लोकसभा चुनाव हैं.

सवर्ण जातियों को आरक्षण देने के फ़ैसले से देश के अलग-अलग राज्यों में चले तीन जातीय आंदोलनों का भी फ़ौरी तौर पर तो शमन हो जाएगा.

गुजरात में पाटीदार आंदोलन, महाराष्ट्र में मराठा और हरियाणा में जाट आंदोलन ने सरकार के लिए बहुत मुश्किल खड़ी कर दी थी.

इत्तफ़ाक़ से तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है, इसलिए बात सीधे मोदी तक पहुंचती थी. ये तीनों जातियां पिछड़े वर्ग के कोटे में आरक्षण की मांग कर रही थीं.

उनकी मांग का समर्थन करना पिछड़ों की नाराज़गी का सबब बन सकता था. आरक्षण की सीमा 49.5 फ़ीसदी से बढ़ाकर 59.5 फीसदी करने से किसी से कुछ छीना नहीं जा रहा, इसलिए दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों में अगड़ों को मिलने वाले आरक्षण से कोई नाराज़गी नहीं होगी.

साथ ही सवर्णों में आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़े की शिकायत भी दूर होगी. उसे लगता था कि केवल जाति के कारण उसकी ग़रीबी को ग़रीबी नहीं माना जाता.

मोदी सरकार के इस क़दम से अगड़ी जातियों में पूरी आरक्षण व्यवस्था को लेकर पनप रहे अंसतोष पर थोड़ा पानी पड़ेगा.

इसलिए जातीय वैमनस्य की जो कटुता समाज में दिख रही थी वह थोड़ी तो कम होगी ही.

भाजपा के अंदर भी सवर्णों के एक वर्ग को इस बात का गिला था कि प्रधानमंत्री हर समय पिछड़ों और दलितों की बात करते हैं. सवर्णों के वोट भाजपा को मिलते हैं पर पार्टी और सरकार उनके बारे में कुछ सोचती नहीं.

यह एक नये तरह की सोशल इंजीनीयरिंग है. जिसमें एक वर्ग को कुछ मिलने से दूसरा वर्ग नाराज़ नहीं हो रहा है.

अब संसद में इस मुद्दे पर जिस तरह की राजनीतिक गोलबंदी बनेगी वह काफ़ी हद तक लोकसभा चुनाव का राजनीतिक समीकरण भी तय करेगी.

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